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युवा, शिक्षा और रोजगार: क्या सचमुच बढ़ रहा है अन्याय?

राहुल गांधी के आरोपों के बहाने शिक्षा और रोजगार व्यवस्था की पड़ताल

NSI Admin17 Jul 2026, 04:48 PM5 views4 min read
युवा, शिक्षा और रोजगार: क्या सचमुच बढ़ रहा है अन्याय?

पीयूष पुरोहित का विशेष आलेख-

भारत दुनिया का सबसे युवा देश माना जाता है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। ऐसे में शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि देश के भविष्य से जुड़े विषय हैं। हाल ही में कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश के युवाओं के साथ अन्याय हो रहा है—शिक्षा महंगी हो गई है, रोजगार के अवसर घट गए हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की संभावना बेहद कम हो गई है और पेपर लीक युवाओं का भविष्य बर्बाद कर रहा है। इन बयानों के बाद एक बार फिर शिक्षा और रोजगार व्यवस्था पर बहस तेज हो गई है।

क्या शिक्षा पहले सस्ती थी ?

राहुल गांधी का कहना है कि आज उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। यह सच है कि निजी मेडिकल, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट संस्थानों की फीस पिछले दो दशकों में लगातार बढ़ी है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह प्रक्रिया केवल वर्तमान सरकार के कार्यकाल में शुरू नहीं हुई।

डॉ. मनमोहन सिंह (2004–2014) के कार्यकाल में भी निजी शिक्षा संस्थानों का तेजी से विस्तार हुआ और उनकी फीस लगातार बढ़ती रही। उस समय भी निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की फीस लाखों रुपये थी। हालांकि सरकारी विश्वविद्यालयों, आईआईटी, एनआईटी, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और एम्स जैसे संस्थानों में फीस अपेक्षाकृत कम थी। आज भी सरकारी संस्थानों की फीस निजी संस्थानों की तुलना में काफी कम है।

इसलिए यह कहना कि शिक्षा केवल वर्तमान सरकार के समय ही महंगी हुई, पूरी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता। शिक्षा की बढ़ती लागत के पीछे निजीकरण, महंगाई, आधुनिक संसाधनों पर बढ़ता खर्च और पेशेवर शिक्षा की मांग जैसे कई कारण हैं।

रोजगार: सबसे बड़ी चुनौती

राहुल गांधी का आरोप है कि युवाओं के लिए रोजगार के अधिकांश रास्ते बंद हो चुके हैं। बेरोजगारी निश्चित रूप से देश की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। प्रतियोगी परीक्षाओं में करोड़ों आवेदन आते हैं, जबकि रिक्तियां सीमित होती हैं। ऐसा केवल इस शासन में हुआ हो ऐसा नहीं है। पिछले वर्षों के आंकड़े उठाकर देखा जाये तो कमोबेश ऐसी ही हालात पहले रहे है।

वहीं वर्तमान केंद्र सरकार का दावा है कि स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, मुद्रा योजना और स्किल इंडिया जैसी योजनाओं के माध्यम से रोजगार और स्वरोजगार के लाखों अवसर तैयार किए गए हैं। दूसरी ओर विपक्ष का कहना है कि सरकारी नौकरियों में रिक्त पद समय पर नहीं भरे जा रहे हैं और निजी क्षेत्र में भी पर्याप्त अवसर नहीं बन रहे।

सच्चाई यह है कि रोजगार का मुद्दा किसी एक सरकार तक सीमित नहीं है। बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, तकनीकी बदलाव और बढ़ती आबादी ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है।

प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा

आज UPSC, SSC, रेलवे, बैंक, NEET और JEE जैसी परीक्षाओं में लाखों उम्मीदवार शामिल होते हैं, जबकि सीटें और रिक्तियां सीमित रहती हैं। ऐसे में चयन प्रतिशत बहुत कम होना स्वाभाविक है। राहुल गांधी का "150 में से एक" वाला आंकड़ा प्रतीकात्मक हो सकता है, लेकिन यह प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती प्रतिस्पर्धा की वास्तविकता को भी दर्शाता है।

पेपर लीक: युवाओं का भरोसा टूटा

पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों में कई भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं के पेपर लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं। इससे लाखों युवाओं की मेहनत प्रभावित हुई है। कांग्रेस साशित राज्य राजस्थान पेपर लीक का बड़ा केंद्र बनकर उभरा था।

केंद्र सरकार ने पेपर लीक रोकने के लिए लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू किया है। हालांकि विपक्ष का कहना है कि कानून बनने के बाद भी कई राज्यों में ऐसी घटनाएं पूरी तरह नहीं रुकी हैं।

तुलना राजनीति नहीं, समाधान की हो

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या बढ़ी और नए IIT, IIM तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित हुए। वहीं वर्तमान सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020), डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण पर जोर दिया है।

दोनों सरकारों की अपनी उपलब्धियां और चुनौतियां रही हैं। इसलिए केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाने के बजाय आवश्यक है कि शिक्षा को अधिक सुलभ बनाया जाए, भर्ती प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाया जाए, पेपर लीक पर प्रभावी रोक लगे और रोजगार सृजन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए।

आज युवा किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। यदि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाएं और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलेगा, तो देश की विकास यात्रा प्रभावित होगी। राहुल गांधी के बयान राजनीतिक हो सकते हैं, लेकिन उन्होंने जिन मुद्दों को उठाया है, वे वास्तविक चिंताओं से जुड़े हैं,लेकिन समय और टाइमिंग को लेकर सवाल उठना लाजमी है,क्योकि सत्ता में रहते ऐसी चिंताए राहुल गाँधी ने नहीं की । दूसरी ओर, सरकार का पक्ष भी यह है कि शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में कई सुधार किए गए हैं। ऐसे में आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि ऐसी नीतियों की है जो युवाओं के भविष्य को सुरक्षित और मजबूत बना सकें।

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