नई दिल्ली,वाणिज्य संवाददाता। उद्योगपति गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी के खिलाफ अमेरिका में चल रहा बहुचर्चित आपराधिक मामला अब खत्म हो गया है। न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने 10 अगस्त 2026 को अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) की याचिका स्वीकार करते हुए आपराधिक आरोपों को खारिज कर दिया। हालांकि, मामले को खत्म करते हुए जज निकोलस गरॉफिस ने DOJ की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा मामला वापस लेने के तरीके में कई ऐसी अनियमितताएं थीं, जो चिंता पैदा करती हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने अडानी को आरोपों के तथ्यात्मक आधार पर निर्दोष घोषित नहीं किया है। जज ने साफ किया कि मामला खारिज करना इस बात पर उनकी राय नहीं है कि मूल आरोप सही थे या गलत। यह फैसला मुख्य रूप से अभियोजन पक्ष के मामला आगे न बढ़ाने के निर्णय और उससे जुड़ी कानूनी प्रक्रिया से संबंधित है।
क्या था पूरा मामला?
नवंबर 2024 में अमेरिका के ब्रुकलिन स्थित संघीय अभियोजकों ने गौतम अडानी, सागर अडानी और अन्य लोगों पर कथित रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी से जुड़े आरोप लगाए थे।
अमेरिकी अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अडानी समूह से जुड़े लोगों ने भारत में एक सोलर पावर प्रोजेक्ट के लिए सरकारी अधिकारियों को कथित तौर पर रिश्वत देने की योजना बनाई थी। इसके साथ ही आरोप था कि अमेरिकी निवेशकों को कंपनी की एंटी-करप्शन नीतियों और कारोबारी गतिविधियों के बारे में भ्रामक जानकारी दी गई। अडानी समूह और अडानी ने इन आरोपों से लगातार इनकार किया।
मामले में सिक्योरिटीज फ्रॉड और वायर फ्रॉड से जुड़े आरोप भी लगाए गए थे। लेकिन मुकदमा ट्रायल तक पहुंचने से पहले ही अमेरिकी न्याय विभाग ने इसे खत्म करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
मामला खारिज होने की 5 बड़ी वजहें
1. DOJ ने कहा- मामला आगे चलाना जरूरी नहीं
अमेरिकी न्याय विभाग ने मई 2026 में अदालत से आरोपों को स्थायी रूप से खारिज करने की मांग की। DOJ का कहना था कि उसने मामले की समीक्षा के बाद अपने अभियोजन विवेकाधिकार के तहत इन आपराधिक आरोपों पर आगे संसाधन खर्च नहीं करने का फैसला किया है। यानी अभियोजन पक्ष ने अदालत से कहा कि वह अब इस केस को आगे नहीं बढ़ाना चाहता।
2. मामला मुख्य रूप से अमेरिका के बाहर की घटनाओं से जुड़ा था
DOJ के वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैककटर ने अदालत में दाखिल दस्तावेजों में कहा कि यह मामला मुख्य रूप से विदेशी गतिविधियों से संबंधित था। उनके मुताबिक आरोपों को अमेरिकी अदालत में साबित करना भी चुनौतीपूर्ण था। यही वजह DOJ के फैसले के महत्वपूर्ण आधारों में शामिल रही।
3. आरोपों को साबित करने में अभियोजन पक्ष को कठिनाई-DOJ ने यह भी तर्क दिया कि मामले को अदालत में सफलतापूर्वक साबित करना मुश्किल हो सकता है। खासतौर पर जब कथित गतिविधियों का बड़ा हिस्सा भारत में हुआ था और अमेरिकी अधिकार क्षेत्र से जुड़े सवाल भी मौजूद थे।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने यह फैसला दिया कि आरोप झूठे थे। सिर्फ इतना हुआ कि अमेरिकी सरकार ने अभियोजन जारी रखने से पीछे हटने का फैसला किया।
4. अमेरिकी सरकार की प्राथमिकताएं बदल गईं-DOJ ने यह भी कहा कि मामला उसकी मौजूदा प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं था। जुलाई में दाखिल दस्तावेजों में विभाग ने विदेशी मामलों की प्रकृति, मुकदमे को साबित करने की कठिनाई और एजेंसी की बदलती प्राथमिकताओं को मामला छोड़ने के कारणों में शामिल किया।
5. अडानी के $10 अरब निवेश प्रस्ताव पर उठे सवाल, लेकिन अदालत ने इसे कारण नहीं माना-यह मामला सबसे ज्यादा चर्चा में इसलिए आया क्योंकि अडानी पक्ष ने अमेरिका में करीब 10 अरब डॉलर निवेश करने की अपनी प्रतिबद्धता का उल्लेख किया था।
अडानी के वकीलों ने DOJ के साथ बातचीत में संकेत दिया था कि समूह अमेरिका में निवेश करने की अपनी योजना को मामले के समाधान के हिस्से के तौर पर आगे बढ़ाने को तैयार है। इसके बाद सवाल उठा कि क्या इस निवेश प्रस्ताव का केस खत्म करने के फैसले से कोई संबंध था।
अडानी ने अदालत में शपथपत्र देकर कहा कि उन्हें किसी ऐसे समझौते या सौदे की जानकारी नहीं थी जिसके बदले मामला खत्म किया गया हो। जज गरॉफिस ने भी कहा कि उन्हें इस बात का संतोष है कि 10 अरब डॉलर के निवेश प्रस्ताव ने DOJ के निर्णय को प्रभावित नहीं किया।
फिर जज ने DOJ की प्रक्रिया पर सवाल क्यों उठाए?
मामला खारिज करने की अनुमति देते हुए जज निकोलस गरॉफिस ने DOJ के वरिष्ठ अधिकारी ट्रेंट मैककटर की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की। जज के मुताबिक, मैककटर ने मामले को खत्म करने का फैसला करते समय उन अभियोजकों और जांच अधिकारियों की राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया, जिन्होंने लंबे समय तक मामले की जांच की थी।
अदालत ने इस प्रक्रिया में मौजूद अनियमितताओं को चिंताजनक बताया। जज ने यह भी कहा कि मैककटर ने विभिन्न संघीय एजेंसियों के अधिकारियों की पेशेवर राय को दरकिनार करते हुए अपना स्वतंत्र निर्णय लिया।
हालांकि, जज ने अंततः यह भी माना कि अभियोजन पक्ष को मामला वापस लेने के फैसले में काफी अधिकार प्राप्त हैं और अदालत की भूमिका सीमित है। इसलिए उन्होंने DOJ के निर्णय पर अपनी असहमति के बावजूद आपराधिक मामला खारिज कर दिया।





