PoliticsBreaking

जंतर-मंतर पर छात्रों की आवाज, झारखंड में चुप्पी क्यों? सवाल सिर्फ लाठीचार्ज का नहीं, सियासत के दोहरे मापदंड का भी

झारखंड की राजधानी रांची में परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रतियोगी अभ्यर्थियों का आंदोलन 17वें दिन भी जारी रहा। विधानसभा की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों ने कई पुलिस बैरिकेड तोड़े। इसके बाद जगन्नाथपुर मंदिर के पास पुलिस ने पानी की बौछारें कीं और लाठीचार्ज किया। इस कार्रवाई में कुछ प्रदर्श

NSI Admin10 Aug 2026, 12:24 PM20 views6 min read
जंतर-मंतर पर छात्रों की आवाज, झारखंड में चुप्पी क्यों? सवाल सिर्फ लाठीचार्ज का नहीं, सियासत के दोहरे मापदंड का भी

-पीयूष पुरोहित की खास रिपोर्ट

नई दिल्ली/ रांची। छात्रों के अधिकारों और लोकतांत्रिक विरोध की बात जब दिल्ली के जंतर-मंतर से उठती है, तो राजनीतिक दलों से लेकर विपक्ष तक उसकी गूंज सुनाई देती है। पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठते हैं, सरकार से जवाब मांगा जाता है और युवाओं की आवाज दबाने के आरोप लगाए जाते हैं। लेकिन वही सवाल जब झारखंड में छात्रों के आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को लेकर उठता है, तो राजनीतिक आवाजें अचानक कमजोर क्यों पड़ जाती हैं? रांची में जारी छात्र आंदोलन ने इसी विरोधाभास को एक बार फिर सामने ला दिया है।

झारखंड की राजधानी रांची में परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रतियोगी अभ्यर्थियों का आंदोलन 17वें दिन भी जारी रहा। विधानसभा की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों ने कई पुलिस बैरिकेड तोड़े। इसके बाद जगन्नाथपुर मंदिर के पास पुलिस ने पानी की बौछारें कीं और लाठीचार्ज किया। इस कार्रवाई में कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने की बात सामने आई।

यहां से मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता। असली राजनीतिक सवाल यह है कि छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का पैमाना सत्ता बदलते ही क्यों बदल जाता है?

दिल्ली और रांची के बीच क्यों खड़ा हो रहा है सवाल?

विपक्षी दल जब भाजपा शासित राज्यों में छात्रों या युवाओं पर पुलिस कार्रवाई का विरोध करते हैं, तो लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और युवाओं के अधिकारों की बात प्रमुखता से उठाई जाती है। लेकिन झारखंड में जब इसी तरह का टकराव सामने आया, तो उन राजनीतिक दलों की मुखरता अपेक्षाकृत कम दिखाई दी।

इसका एक राजनीतिक संदर्भ भी है। झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार है और झारखंड मुक्ति मोर्चा विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। ऐसे में विपक्षी दलों के सामने स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा होता है कि क्या सरकार के खिलाफ छात्रों की आवाज का समर्थन राजनीतिक समीकरणों से प्रभावित हो रहा है?

यही वह बिंदु है जहां भाजपा विपक्ष पर दोहरे मापदंड का आरोप लगा रही है। सवाल यह नहीं कि किसी एक पार्टी ने किस आंदोलन का समर्थन किया या नहीं किया। बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक अधिकारों की परिभाषा सत्ता के पक्ष-विपक्ष के हिसाब से तय होनी चाहिए?

आंदोलन की जड़ में क्या है?

रांची में प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों की मुख्य मांग जेएसएससी-सीजीएल समेत विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, कुछ परीक्षाओं को रद्द करना और जेपीएससी-जेएसएससी की भर्ती व्यवस्था में व्यापक सुधार है।

प्रदर्शनकारी सीबीआई जांच या राज्य से बाहर के उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति से जांच की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की 98 प्रतिशत मांगें स्वीकार की जा चुकी हैं। यहीं सरकार और आंदोलनकारियों के दावों के बीच सबसे बड़ा अंतर सामने आता है।

आंदोलनकारियों का कहना है कि उन्होंने 13 परीक्षाओं को रद्द करने की मांग रखी थी, जबकि सरकार केवल तीन परीक्षाओं पर सहमत हुई है। यानी दोनों पक्ष अपने-अपने आंकड़ों और दावों के आधार पर आंदोलन की तस्वीर पेश कर रहे हैं। बातचीत के कई दौर के बाद भी यदि गतिरोध कायम है, तो यह इस बात का संकेत है कि विवाद महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि भरोसे के संकट में बदल चुका है।

मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर सड़क पर उतरे छात्र

रांची में आंदोलन ने उस समय और राजनीतिक ध्यान खींचा जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का 51वां जन्मदिन भी था। सुबह करीब साढ़े 10 बजे प्रदर्शनकारी तिरंगा और तख्तियां लेकर विधानसभा की ओर बढ़े।

प्रदर्शन में लगे पोस्टरों पर सरकार और मुख्यमंत्री से छात्रों के सवालों का जवाब देने की मांग की गई। यह दृश्य बताता है कि आंदोलन अब केवल परीक्षा संबंधी मांगों तक सीमित नहीं रह गया है। छात्रों के बीच यह भावना भी मजबूत हो रही है कि उनकी शिकायतों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं सुना जा रहा।

हालांकि, किसी भी आंदोलन के मूल्यांकन में यह भी जरूरी है कि प्रदर्शनकारियों की मांगों के साथ-साथ कानून-व्यवस्था और पुलिस के दावों को भी निष्पक्ष रूप से देखा जाए। पुलिस का कहना है कि उसने संयम बरता। करीब चार किलोमीटर के मार्च रूट पर 1,500 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे और निषेधाज्ञा भी लागू थी। प्रदर्शनकारियों की ओर से बैरिकेड तोड़े जाने के बाद पुलिस कार्रवाई हुई।

यानी घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी मौजूद है। लेकिन यहां भी सवाल बना रहता है कि क्या भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किए गए बल की मात्रा और तरीका उचित था? इसका निष्पक्ष आकलन तथ्यों और स्वतंत्र जांच के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर।

भूख हड़ताल ने आंदोलन को दिया मानवीय चेहरा

इस आंदोलन का एक मानवीय पहलू भी सामने आया। नौ दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे जेएलकेएम नेता देवेंद्रनाथ महतो ने वजन कम होने के बावजूद एंबुलेंस से मार्च में हिस्सा लिया और प्रदर्शनकारियों से शांति बनाए रखने की अपील की।

आंदोलन की अगुवाई कर रहे जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म्स मंच ने भी कथित असामाजिक तत्वों को आंदोलन से दूर रखने के लिए करीब 500 स्वयंसेवकों की तैनाती की।

इससे संकेत मिलता है कि आंदोलन के आयोजक इसे अनुशासित और शांतिपूर्ण बनाए रखने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन दूसरी तरफ बैरिकेड तोड़ने जैसी घटनाएं यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि आंदोलन के दौरान नियंत्रण और प्रशासनिक निर्देशों के पालन को लेकर दोनों पक्षों की जिम्मेदारी क्या थी।

असली परीक्षा सरकार की ही नहीं, विपक्ष की भी

झारखंड की घटना ने राजनीतिक दलों के सामने असहज सवाल खड़ा कर दिया है। यदि छात्रों के अधिकारों की रक्षा लोकतंत्र का मूल प्रश्न है, तो यह अधिकार किसी खास राज्य, पार्टी या सरकार के आधार पर बदल नहीं सकता। भाजपा शासित राज्य में पुलिस कार्रवाई गलत है तो विपक्ष शासित राज्य में भी उसी कसौटी से उसकी समीक्षा होनी चाहिए। इसी तरह यदि किसी आंदोलन में कानून-व्यवस्था का उल्लंघन होता है, तो राजनीतिक दलों को केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर उसका समर्थन या विरोध नहीं करना चाहिए। यही कारण है कि झारखंड का आंदोलन विपक्ष की भी राजनीतिक परीक्षा बन गया है। क्या छात्र सिर्फ तब महत्वपूर्ण हैं, जब उनकी आवाज किसी प्रतिद्वंद्वी सरकार के खिलाफ उठ रही हो? अगर जवाब 'नहीं' है, तो फिर रांची के छात्रों की आवाज पर भी वही राजनीतिक गंभीरता दिखाई देनी चाहिए, जो दूसरे राज्यों में दिखाई जाती है।

छात्रों को बयान नहीं, भरोसा चाहिए

अंततः इस पूरे विवाद का समाधान राजनीतिक बयानबाजी से नहीं होगा। छात्रों को यह भरोसा चाहिए कि भर्ती परीक्षाओं में यदि कोई अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होगी, दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई होगी और भविष्य की भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी होगी।

सरकार के लिए चुनौती सिर्फ आंदोलन खत्म कराना नहीं, बल्कि भर्ती व्यवस्था में युवाओं का भरोसा बहाल करना है। वहीं विपक्ष के लिए चुनौती यह है कि वह सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर छात्रों के सवालों पर समान मानदंड अपनाए।

रांची की सड़कों पर उठी यह आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सवाल केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में छात्रों के अधिकार सत्ता के हिसाब से बदलेंगे या सिद्धांत के हिसाब से—फैसला राजनीतिक दलों को करना है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है: जंतर-मंतर पर छात्रों की आवाज लोकतंत्र की आवाज है, तो रांची में वही आवाज क्यों नहीं ?

Daily Briefing

Stay Ahead of Every Story

Breaking news, top stories, and exclusive coverage -- delivered to your inbox every morning.

N
NSI AdminAuthor

Comments

Sign in to join the conversation

Sign In to Comment

More from Politics

View All
शरद पवार के बाद एमके स्टालिन  भी आएंगे पीएम मोदी के साथ ! भारत का चुनावी गणित बदलने की तैयारी लगभग पूरीBreaking
Politics

शरद पवार के बाद एमके स्टालिन भी आएंगे पीएम मोदी के साथ ! भारत का चुनावी गणित बदलने की तैयारी लगभग पूरी

NSI Admin·about 3 hours ago·5 min read
महिला आरक्षण पर फिर आमने-सामने राहुल और रिजिजू, केंद्रीय मंत्री ने कानून की धाराओं से दिया जवाब
Politics

महिला आरक्षण पर फिर आमने-सामने राहुल और रिजिजू, केंद्रीय मंत्री ने कानून की धाराओं से दिया जवाब

NSI Admin·2 days ago·3 min read
आईआईटी निदेशक पर टिप्पणी को लेकर घिरीं प्रियंका गांधी, भाजपा ने योग्यता और वंशवाद पर छेड़ी बहसBreaking
Politics

आईआईटी निदेशक पर टिप्पणी को लेकर घिरीं प्रियंका गांधी, भाजपा ने योग्यता और वंशवाद पर छेड़ी बहस

NSI Admin·12 days ago·2 min read
लोकसभा में हंगामे के बीच पेश हुआ लोक परीक्षा संशोधन विधेयक-2026, विपक्ष के विरोध से चर्चा टली
Politics

लोकसभा में हंगामे के बीच पेश हुआ लोक परीक्षा संशोधन विधेयक-2026, विपक्ष के विरोध से चर्चा टली

NSI Admin·14 days ago·3 min read