नई दिल्ली: दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र उमर खालिद की किताब ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’ पर परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने किताब को झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समाज, उनके इतिहास और सत्ता के बदलते ढांचों को समझने वाली महत्वपूर्ण अकादमिक कृति बताया। किताब उमर खालिद की पीएचडी शोध पर आधारित है और 2026 में पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई है।
परिचर्चा में राज्यसभा सांसद मनोज झा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद, प्रोफेसर प्रभु महापात्रा, वरिष्ठ पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी और ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन समेत कई लोग शामिल हुए। कार्यक्रम का एक भावनात्मक पक्ष यह भी रहा कि यह आयोजन खालिद के जेल में बिताए जा रहे छठे वर्ष के दौरान उनके जन्मदिन के अवसर पर किया गया।
सिंहभूम के आदिवासी इतिहास पर केंद्रित है किताब
‘Fractured Communities’ मुख्य रूप से वर्तमान झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र और वहां रहने वाले हो आदिवासी समुदाय के इतिहास को केंद्र में रखती है। किताब में ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्थाओं, स्थानीय सत्ता संरचनाओं, जमीन, जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण तथा आदिवासी समाज के भीतर हुए राजनीतिक बदलावों का अध्ययन किया गया है।
किताब की खासियत यह है कि यह आदिवासी समाज को केवल बाहरी सत्ता के खिलाफ संघर्ष करने वाले एक समान समुदाय के रूप में नहीं देखती। इसमें यह भी समझने की कोशिश की गई है कि स्थानीय सत्ता संरचनाएं किस तरह औपनिवेशिक प्रशासन से जुड़ीं और इन संबंधों ने आदिवासी समाज के भीतर सत्ता, अधिकार और सामाजिक संबंधों को किस तरह बदला।
थीसिस की जांच करने वाले प्रोफेसर भी रहे मौजूद
प्रोफेसर प्रभु महापात्रा उन लोगों में शामिल रहे हैं जिन्होंने खालिद की पीएचडी थीसिस की जांच की थी। उन्होंने किताब के शोध और उसके विषय से अपने जुड़ाव की बात कही। उनके अनुसार यह काम सिंहभूम के इतिहास के साथ-साथ उन राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझने की कोशिश करता है, जिन्होंने वहां के आदिवासी समुदायों को आकार दिया।
किताब के प्रकाशक और अन्य पुस्तक समीक्षाओं में भी इसे अभिलेखीय शोध और राजनीतिक इतिहास के मेल के तौर पर रेखांकित किया गया है। शोध मूल रूप से जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में जुलाई 2018 में जमा किया गया था। बाद में इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया।

मां सबीहा खानुम बोलीं- खुशी और दुख दोनों का पल
कार्यक्रम में उमर खालिद की मां सबीहा खानुम ने कहा कि किताब का पाठकों तक पहुंचना परिवार के लिए खुशी की बात है, लेकिन इस खुशी के साथ यह दुख भी जुड़ा है कि किताब का लेखक खुद जेल में है।
उन्होंने बताया कि खालिद ने कानूनी और अन्य कठिन परिस्थितियों के बीच अपनी पीएचडी पूरी की। उनके मुताबिक, थीसिस जमा करने में भी मुश्किलें आईं और अदालत के हस्तक्षेप के बाद इसे जमा किया जा सका।
सबीहा खानुम ने लोगों से अपील की कि वे किताब को केवल इसलिए न पढ़ें कि उसका लेखक जेल में है, बल्कि उसके अकादमिक और ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए पढ़ें।
उमर खालिद ने खुद भी बताई थी किताब की पृष्ठभूमि
किताब के प्रकाशन के बाद उमर खालिद ने अपने एक लेख में बताया था कि आदिवासी इतिहास में उनकी रुचि 2000 के दशक के अंत में बढ़ी, जब झारखंड और दूसरे आदिवासी इलाकों में जल-जंगल-जमीन, विस्थापन, विकास और लोकतंत्र को लेकर आंदोलनों ने व्यापक बहस को जन्म दिया था। उन्होंने लिखा कि उनका उद्देश्य आदिवासी समाज को केवल ‘बाहरी’ सत्ता के खिलाफ खड़े एक एकरूप समुदाय के तौर पर देखने के बजाय उसके भीतर मौजूद राजनीतिक संबंधों और सत्ता के समीकरणों को समझना था।
किताब की अकादमिक अहमियत पर क्यों हो रही है चर्चा?
किताब को लेकर सामने आई समीक्षाओं में इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका इतिहास को सरल खांचे में बांटने से बचना बताया गया है। इतिहासकारों और लेखकों ने कहा है कि किताब आदिवासी समाज को केवल परंपरा और संस्कृति के नजरिए से नहीं देखती, बल्कि राजनीतिक एजेंसी, प्रशासन, संसाधनों और सत्ता के संबंधों के संदर्भ में भी समझती है।
हालांकि, कुछ समीक्षकों ने किताब की सीमाओं की ओर भी ध्यान दिलाया है। उदाहरण के लिए, एक समीक्षा में कहा गया कि बाद के दौर में राजनीतिक अर्थव्यवस्था, विकास और संसाधनों के बड़े सवालों को और विस्तार से शामिल किया जाता तो पुस्तक का विश्लेषण और व्यापक हो सकता था।
जेल और किताब के बीच उमर खालिद की कहानी
उमर खालिद सितंबर 2020 से दिल्ली दंगों से जुड़े बड़े षड्यंत्र मामले में जेल में हैं। उन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत मामला चल रहा है। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत देने से इनकार किया था। अप्रैल में उनकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज हुई, हालांकि मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में जमानत के मानकों से जुड़े व्यापक सवाल को बड़ी पीठ के समक्ष भेजने का फैसला किया।





