—पीयूष पुरोहित
भारत में रसोई गैस (एलपीजी) अब केवल एक ईंधन नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। एक समय था जब ग्रामीण क्षेत्रों में खाना बनाने के लिए लकड़ी, कोयला और गोबर के उपलों का व्यापक उपयोग होता था। इससे महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ते थे। लेकिन प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से करोड़ों गरीब परिवारों तक एलपीजी कनेक्शन पहुंचने के बाद देश में स्वच्छ ईंधन के उपयोग को नई गति मिली। आज एलपीजी सामाजिक कल्याण, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण—तीनों से जुड़ा विषय बन चुका है।
इसी कारण जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और एलपीजी की कीमतों में तेजी आती है तो सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि उपभोक्ताओं को राहत कैसे दी जाए। मौजूदा समय में पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर ईरान और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण परिस्थितियों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। इसका सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर पड़ रहा है।
हालिया वित्तीय आकलनों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में एलपीजी सब्सिडी का खर्च बजट में निर्धारित लगभग 300 अरब रुपये के प्रावधान से काफी अधिक हो सकता है। कुछ विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि वर्तमान स्थिति बनी रही तो सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर कुल सब्सिडी का बोझ एक ट्रिलियन रुपये (एक लाख करोड़ रुपये) से भी अधिक पहुंच सकता है। यह केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की आर्थिक नीति के सामने खड़ी बड़ी चुनौती का संकेत है।
भारत पर ज्यादा असर क्यों पड़ता है?
भारत विश्व के सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश अपनी तेल और गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल या एलपीजी की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है।
सरकार के सामने दो विकल्प होते हैं। पहला, अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुरूप घरेलू बाजार में गैस की कीमतें बढ़ा दी जाएं। दूसरा, उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए कीमतों को सीमित रखा जाए और अंतर का भुगतान सरकार तथा तेल कंपनियां करें। वर्तमान में भारत ने दूसरा रास्ता अपनाया है, जिससे आम लोगों को राहत तो मिल रही है, लेकिन सरकार और तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव लगातार बढ़ रहा है।
सब्सिडी क्यों जरूरी है?
एलपीजी सब्सिडी केवल आर्थिक सहायता नहीं है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। देश के करोड़ों गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए हर महीने रसोई गैस खरीदना आसान नहीं होता। यदि गैस सिलेंडर की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप पूरी तरह बढ़ा दी जाएं तो बड़ी संख्या में परिवार दोबारा पारंपरिक ईंधनों की ओर लौट सकते हैं। इससे महिलाओं के स्वास्थ्य, पर्यावरण और स्वच्छ ऊर्जा अभियान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि सरकार एलपीजी को केवल व्यापारिक उत्पाद नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता के रूप में भी देखती है।
लेकिन सब्सिडी का बढ़ता बोझ भी चिंता का विषय-लगातार बढ़ती सब्सिडी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर पड़ता है। सबसे पहले इसका प्रभाव केंद्र सरकार के वित्तीय घाटे (Fiscal Deficit) पर पड़ता है। जब सरकार को अनुमान से अधिक राशि सब्सिडी पर खर्च करनी पड़ती है, तब विकास योजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण की अन्य योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर दबाव बढ़ जाता है।
दूसरी ओर, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को भी लंबे समय तक घाटा उठाना पड़ता है। यदि कंपनियां लगातार नुकसान सहेंगी तो उनकी निवेश क्षमता प्रभावित होगी, जिससे भविष्य में रिफाइनरी विस्तार, पाइपलाइन नेटवर्क और नई ऊर्जा परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है।
क्या सब्सिडी का वर्तमान मॉडल टिकाऊ है?
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था लंबे समय तक व्यावहारिक नहीं रह सकती। यदि वैश्विक बाजार में ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार के लिए हर सिलेंडर पर सैकड़ों रुपये की सब्सिडी देना कठिन होगा।
इसलिए अब आवश्यकता यूनिवर्सल सब्सिडी की बजाय टार्गेटेड सब्सिडी की है। यानी सब्सिडी केवल उन्हीं परिवारों को मिले जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों को बाजार मूल्य पर गैस खरीदनी चाहिए, जबकि गरीब और कमजोर वर्ग को पूरी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
समाधान क्या हो सकते हैं?
सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि एलपीजी सब्सिडी पूरी तरह जरूरतमंद परिवारों तक सीमित की जाए। इससे सरकारी खर्च में कमी आएगी और वास्तविक लाभार्थियों को सहायता मिलती रहेगी। दूसरा, भारत को घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाने और आयात के स्रोतों में विविधता लाने पर तेजी से काम करना होगा। इससे अंतरराष्ट्रीय संकटों का प्रभाव कम होगा।
तीसरा, पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG), बायोगैस, कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी वैकल्पिक ऊर्जा प्रणालियों को तेज गति से बढ़ावा देना होगा।
*चौथा, रणनीतिक ऊर्जा भंडार (Strategic Energy Reserves) को मजबूत किया जाए, ताकि वैश्विक संकट के समय कीमतों के झटकों को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सके।
*पांचवां, ऊर्जा संरक्षण और दक्षता को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए। जितनी कम ऊर्जा की खपत होगी, उतना ही आयात पर दबाव कम होगा।
संतुलन ही सबसे बड़ी चुनौती-
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक ओर आम जनता को महंगाई से राहत देनी है और दूसरी ओर देश की वित्तीय स्थिति को भी मजबूत बनाए रखना है। यदि सब्सिडी बहुत अधिक बढ़ाई जाती है तो राजकोषीय घाटा बढ़ेगा, और यदि सब्सिडी कम कर दी जाती है तो करोड़ों परिवारों पर महंगाई का बोझ बढ़ जाएगा।
यही कारण है कि आने वाले वर्षों में ऊर्जा नीति का केंद्र संतुलन होगा—ऐसा संतुलन जिसमें गरीबों को सुरक्षा मिले, मध्यम वर्ग पर अनावश्यक बोझ न पड़े, तेल कंपनियां आर्थिक रूप से मजबूत रहें और सरकार का वित्तीय अनुशासन भी कायम रहे।





