जयपुर, 14 अगस्त 2026। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति की गई कथित अभद्र एवं आपत्तिजनक टिप्पणियों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष द्वारा देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के खिलाफ इस प्रकार की भाषा का प्रयोग लोकतांत्रिक एवं राजनीतिक मर्यादाओं के अनुरूप नहीं है। राठौड़ ने कहा कि राहुल गांधी ने जिस तरह प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाया सार्वजनिक रूप से अपमानजनक टिप्पणी की, उसे किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। राजनीति को इस स्तर तक गिराने और गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल करने से कांग्रेस का कोई भला नहीं होने वाला है। भारत की संस्कृति सदैव ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की रही है और सार्वजनिक जीवन में इस प्रकार की भाषा एवं आचरण का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि संसद के सत्र के तुरंत बाद कांग्रेस के औपचारिक मंच से राहुल गांधी द्वारा जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया, वह अत्यंत निंदनीय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति इस्तेमाल किए गए शब्दों से स्पष्ट होता है कि कांग्रेस का राजनीतिक विमर्श लगातार गिरते स्तर की ओर जा रहा है। देश की जनता यह समझ चुकी है कि जो लोग देश के सेना प्रमुख के प्रति अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं और देशविरोधी नारों से जुड़े लोगों के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं, वही लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति भी अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में देश की जनता यह जानती है कि कौन वास्तव में देशहित और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की बात कर रहा है और कौन राजनीतिक कुंठा के चलते संवैधानिक पदों की गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम कर रहा है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा कि राहुल गांधी का हालिया आचरण राजनीतिक अपरिपक्वता, व्यक्तिगत कुंठा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनकी लगातार दिखाई देने वाली राजनीतिक ईर्ष्या का परिणाम है या इसके पीछे कोई सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र है। देश की जनता यह भली भांती समझ चुकी है। इसलिए कांग्रेस सिकुड़कर दो तीन राज्यों में रह गई। कांग्रेस के पतन का कारण, कांग्रेस के युवराज की भाषा और व्यवहार ही है। जबकि वे इसके लिए जिम्मेदार कभी संवैधानिक संस्थाओं को तो कभी ईवीएम मशीन को ठहराते है। नेता प्रतिपक्ष को देश के प्रधानमंत्री और किसी भी विदेशी प्रमुख पर इस तरह की टिप्पणी शोभा नहीं देती। लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वीकार्य हैं, लेकिन संवैधानिक पदों की गरिमा और देश की प्रतिष्ठा से समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता।





