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जनता और छात्रों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है क्या छात्रसंघ चुनाव की मांग या सियासी सुविधा?

आज कांग्रेस के छात्र संगठन विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में चुनाव बहाल करने के लिए भाजपा सरकार के खिलाफ सड़क पर हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब कांग्रेस की अपनी सरकार सत्ता में थी, तब छात्रसंघ चुनावों को लेकर उसका रवैया क्या था?

NSI Admin10 Aug 2026, 12:43 PM54 views3 min read
जनता और छात्रों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है क्या छात्रसंघ चुनाव की मांग या सियासी सुविधा?

पीयूष पुरोहित की खास रिपोर्ट

जयपुर। राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर कांग्रेस का छात्र संगठन और उससे जुड़े संगठन प्रदेशभर में प्रदर्शन कर रहे हैं। लोकतंत्र की बात हो, युवाओं की भागीदारी की बात हो या छात्रों को अपनी पसंद के प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देने की बात—इन मांगों को सुनने में कोई आपत्ति नहीं हो सकती। सवाल मांग पर नहीं, मांग करने वालों के राजनीतिक रिकॉर्ड और उनके दोहरे मापदंड पर है।

आज कांग्रेस के छात्र संगठन विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में चुनाव बहाल करने के लिए भाजपा सरकार के खिलाफ सड़क पर हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब कांग्रेस की अपनी सरकार सत्ता में थी, तब छात्रसंघ चुनावों को लेकर उसका रवैया क्या था?

अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगाई गई थी। उस समय भी प्रदेश के छात्र राजनीति से जुड़े संगठनों ने चुनाव बहाल करने की मांग उठाई थी। ऐसे में आज वही राजनीतिक धारा लोकतंत्र और छात्र अधिकारों की दुहाई देकर भाजपा सरकार से चुनाव कराने की मांग करे, तो जनता और छात्रों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है।

अगर छात्रसंघ चुनाव लोकतंत्र की जरूरत हैं, तो फिर यह जरूरत सत्ता में रहते हुए क्यों महसूस नहीं हुई?

लोकतंत्र का सिद्धांत विपक्ष में रहते हुए अलग और सत्ता में रहते हुए अलग नहीं हो सकता। यदि छात्रसंघ चुनाव छात्रों के अधिकार हैं, तो ये अधिकार किसी सरकार या पार्टी की राजनीतिक सुविधा पर निर्भर नहीं होने चाहिए। कांग्रेस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने अपने शासनकाल में चुनावों पर रोक क्यों लगाई और आज उसी मुद्दे पर भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन क्यों कर रही है।

यहां भाजपा सरकार से भी सवाल पूछा जाना चाहिए। यदि छात्रसंघ चुनाव कराने में कोई संवैधानिक, प्रशासनिक, कानून-व्यवस्था या विश्वविद्यालय संबंधी बाधा है, तो सरकार को उसका स्पष्ट और पारदर्शी जवाब छात्रों के सामने रखना चाहिए। केवल पिछली सरकार की गलतियों का हवाला देकर वर्तमान सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

लेकिन कांग्रेस और उसके समर्थक संगठनों के लिए असली सवाल इससे भी बड़ा है—क्या छात्र राजनीति का लोकतंत्र सत्ता के साथ बदलता रहेगा? सत्ता में रहते हुए चुनाव पर रोक और विपक्ष में आते ही चुनाव बहाली के लिए आंदोलन—इस विरोधाभास को छात्र भी देख रहे हैं और प्रदेश की जनता भी।

छात्रसंघ चुनाव होने चाहिए या नहीं, इस पर स्वस्थ बहस हो सकती है। चुनावों में हिंसा, बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप, शैक्षणिक माहौल प्रभावित होने जैसी चिंताओं का समाधान भी जरूरी है। लेकिन यदि चुनाव लोकतांत्रिक भागीदारी का माध्यम हैं, तो उसका फैसला राजनीतिक सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि समान और स्पष्ट नीति के आधार पर होना चाहिए।

कांग्रेस आज जिस अधिकार की मांग कर रही है, उसे कल सत्ता में रहते हुए भी उतनी ही मजबूती से स्वीकार करना होगा। क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि जो अधिकार विपक्ष में रहते हुए अपने लिए मांगा जाए, वही अधिकार सत्ता में रहते हुए दूसरों को भी दिया जाए।

वरना सवाल सिर्फ छात्रसंघ चुनाव का नहीं रहेगा—सवाल उठेगा कि कांग्रेस को छात्रों का लोकतंत्र चाहिए या सिर्फ छात्रों के मुद्दे पर राजनीति करने का अवसर?

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