पीयूष पुरोहित की खास रिपोर्ट -
जयपुर। राजधानी जयपुर ने बुधवार को एक बार फिर ऐसी राजनीति देखी, जिसमें मुद्दों से ज्यादा शक्ति प्रदर्शन और जनहित से ज्यादा राजनीतिक संदेश प्रमुख दिखाई दिया। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनों ने एक-दूसरे के पार्टी कार्यालयों का घेराव करने का ऐलान किया। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट था कि दोनों दलों के नेताओं को पहले से मालूम था कि पुलिस सुरक्षा कारणों से उन्हें विरोधी दल के कार्यालय तक पहुंचने नहीं देगी।
इसके बावजूद दोनों दलों ने सैकड़ों कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतारा। नारे लगे, भाषण हुए, मीडिया के कैमरों के सामने शक्ति प्रदर्शन हुआ और आखिरकार पुलिस बैरिकेडिंग पर प्रदर्शन समाप्त हो गया। न तो कोई कार्यालय घिरा और न ही किसी दल का घोषित लक्ष्य पूरा हुआ। यदि कुछ हासिल हुआ तो वह केवल राजनीतिक संदेश और सुर्खियां थीं।

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना हर राजनीतिक दल का अधिकार है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि ऐसे कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल राजनीतिक तस्वीरें खिंचवाना या कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाए रखना न रह जाए।
बुधवार के घटनाक्रम ने यह भी दिखाया कि राजनीतिक दलों और प्रशासन के बीच एक तरह की पूर्व-निर्धारित स्थिति बन चुकी थी। पुलिस पहले से बैरिकेडिंग कर तैयार थी और नेताओं को भी अंदाजा था कि वे आगे नहीं बढ़ पाएंगे। इसके बावजूद पूरे शहर में यातायात प्रभावित हुआ, सुरक्षा व्यवस्था में भारी पुलिस बल लगाना पड़ा और हजारों आम नागरिकों को जाम का सामना करना पड़ा। स्कूल से लौटते बच्चे, दफ्तर से घर जाने वाले कर्मचारी, मरीज और रोजमर्रा के काम से निकलने वाले लोग राजनीतिक टकराव की कीमत चुकाते रहे।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध का उद्देश्य जनता की समस्याओं को उठाना है या केवल राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन करना? यदि विरोध प्रदर्शन का परिणाम पहले से तय हो और उसका असर केवल मीडिया कवरेज तथा राजनीतिक संदेश तक सीमित रह जाए, तो उसकी सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता उन्हें केवल नारे लगाने या भीड़ जुटाने के लिए नहीं चुनती। जनता चाहती है कि उसके मुद्दों पर गंभीर बहस हो, समाधान निकले और लोकतांत्रिक विरोध भी इस तरह हो कि आम नागरिकों का जीवन कम से कम प्रभावित हो।
जयपुर की बुधवार की सियासत ने एक बार फिर यह याद दिलाया कि लोकतंत्र में शक्ति का सबसे बड़ा प्रदर्शन भी अंततः जनता के विश्वास से ही तय होता है, सड़कों पर जुटी भीड़ से नहीं। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, लेकिन यदि उसकी कीमत आम नागरिक को ट्रैफिक जाम, असुविधा और अव्यवस्था के रूप में चुकानी पड़े, तो ऐसी राजनीति पर पुनर्विचार होना चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत विरोधी दल के कार्यालय तक पहुंचने में नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने और उनका समाधान खोजने में है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन राजनीतिक दलों का अधिकार है, लेकिन जब ऐसे कार्यक्रमों का परिणाम केवल प्रतीकात्मक शक्ति प्रदर्शन बनकर रह जाए और उसका सीधा असर आम नागरिकों की दिनचर्या पर पड़े, तो उनकी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। बुधवार का घटनाक्रम यही संदेश देता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच जनता की सुविधा और शहर की सामान्य व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी किसी दल की राजनीतिक रणनीति।





