बीकानेर। राजस्थान के उच्च शिक्षा जगत में इन दिनों एक नया विषय चर्चा के केंद्र में है। बीकानेर के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों ने पिछले दिनों लगातार दो दिनों में तीन प्रतिष्ठित व्यक्तियों को मानद पीएचडी (Honorary Doctorate) की उपाधि प्रदान की। पहले महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर ने राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया राहटकर तथा प्रसिद्ध शिक्षाविद् और समाजसेवी अच्युत सामंत को मानद उपाधि से सम्मानित किया। इसके अगले ही दिन स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर ने केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को मानद पीएचडी प्रदान की ।
दो दिनों के भीतर हुए इन आयोजनों ने शिक्षा जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल केवल उपाधि दिए जाने का नहीं है, बल्कि उस प्रक्रिया, चयन के मानकों और विश्वविद्यालयों की प्राथमिकताओं का भी है।
मानद पीएचडी का उद्देश्य
मानद पीएचडी किसी व्यक्ति को उसके असाधारण सामाजिक, शैक्षणिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, प्रशासनिक या सार्वजनिक योगदान के लिए विश्वविद्यालय का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। इसे नियमित शोध और अकादमिक प्रक्रिया से प्राप्त पीएचडी से अलग माना जाता है। इसलिए दुनिया के अधिकांश प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय इस सम्मान को अत्यंत सीमित और कठोर मानकों के आधार पर प्रदान करते हैं।
लगातार दो दिन...और शुरू हुई बहस
बीकानेर के दो विश्वविद्यालयों द्वारा पिछले दिनों लगातार दो दिनों में मानद उपाधियां दिए जाने के बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मानद पीएचडी देने की नई परंपरा विकसित हो रही है, या फिर वर्तमान कुलपतियों के बीच प्रभावशाली व्यक्तियों को सम्मानित करने की एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा दिखाई देने लगी है।
शिक्षा जगत के कई जानकारों का मानना है कि यदि ऐसे निर्णय पूरी पारदर्शिता के साथ नहीं होंगे तो विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक प्राथमिकताओं पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
उठ रहे सवाल......
राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया राहटकर महाराष्ट्र की वरिष्ठ सार्वजनिक जीवन से जुड़ी हस्ती हैं। महिला सशक्तिकरण और सार्वजनिक जीवन में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
फिर भी शिक्षा जगत में यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि यदि उनका योगदान मानद पीएचडी के योग्य था, तो क्या कारण है कि महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों ने उन्हें अब तक इस सम्मान से नहीं नवाजा और बीकानेर के विश्वविद्यालय ने यह पहल की ?
इसी प्रकार शिक्षाविद् अच्युत सामंत ओडिशा में शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में व्यापक कार्यों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की है और उनका योगदान उल्लेखनीय माना जा सकता है।
लेकिन चर्चा यह भी है कि जिनकी कर्मभूमि ओडिशा है, उन्हें सबसे पहले बीकानेर का विश्वविद्यालय मानद पीएचडी से सम्मानित कर रहा है।
मेघवाल को मानद पीएचडी ....
सबसे अधिक चर्चा स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय द्वारा केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को मानद उपाधि दिए जाने पर हो रही है।
कृषि विश्वविद्यालय का मूल उद्देश्य कृषि शिक्षा, कृषि अनुसंधान, ग्रामीण विकास और कृषि नवाचार को बढ़ावा देना है। ऐसे में शिक्षा जगत में यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि विश्वविद्यालय ने अर्जुन राम मेघवाल के किस विशिष्ट योगदान के आधार पर उन्हें अपना सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया।
यदि यह सम्मान उनके व्यापक सार्वजनिक जीवन, प्रशासनिक योगदान या अन्य उपलब्धियों के आधार पर दिया गया है, तो विश्वविद्यालय को इसके कारणों और चयन प्रक्रिया को सार्वजनिक करना चाहिए। इससे अनावश्यक अटकलों पर विराम लगेगा।
प्राथमिकताएं बदल रही हैं...
कई शिक्षाविदों का मानना है कि किसी भीविश्वविद्यालय की पहचान उसके शोध, नवाचार, पेटेंट, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और विद्यार्थियों की उपलब्धियों से बनती है। यदि विश्वविद्यालयों की चर्चा बार-बार केवल मानद उपाधियों और समारोहों तक सीमित होने लगे तो यह उच्च शिक्षा की दिशा को लेकर चिंता का विषय बन सकता है।
यह भी कहा जा रहा है कि यदि एक विश्वविद्यालय प्रभावशाली व्यक्तियों को सम्मानित करता है तो दूसरे विश्वविद्यालय पर भी वैसा ही करने का अप्रत्यक्ष दबाव बन सकता है। यही कारण है कि इसे कुछ लोग कुलपतियों के बीच प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा के रूप में भी देख रहे हैं।
क्या भविष्य में बढ़ेगी यह परंपरा ?
यदि मानद उपाधि देने के लिए कोई स्पष्ट, पारदर्शी और एक समान नीति नहीं बनी, तो भविष्य में प्रभावशाली राजनेताओं, वरिष्ठ अधिकारियों, उद्योगपतियों, धार्मिक नेताओं या अन्य चर्चित व्यक्तियों को भी इसी प्रकार मानद पीएचडी दिए जाने का सिलसिला बढ़ सकता है।
ऐसी स्थिति में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं विश्वविद्यालयों की सर्वोच्च शैक्षणिक उपाधि अपनी विशिष्टता और गरिमा खोने न लगे।
बीकानेर के दोनों विश्वविद्यालयों द्वारा लगातार दो दिनों में मानद पीएचडी प्रदान किया जाना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा की दिशा, विश्वविद्यालयों की प्राथमिकताओं और मानद उपाधियों की गरिमा पर गंभीर विमर्श का विषय बन गया है।
किसी भी विशिष्ट व्यक्ति को सम्मानित करना विश्वविद्यालय का अधिकार है, लेकिन उतना ही आवश्यक है कि यह सम्मान स्पष्ट, निष्पक्ष और पारदर्शी मानकों पर आधारित हो। विश्वविद्यालय यदि चयन के कारणों और प्रक्रिया को सार्वजनिक करें तो ऐसे निर्णयों की विश्वसनीयता और गरिमा दोनों बढ़ेंगी।अन्यथा, यदि प्रभावशाली व्यक्तियों को लगातार मानद उपाधियां देने की परंपरा विकसित होती है, तो आने वाले समय में यह प्रश्न और भी तीखे होंगे कि क्या विश्वविद्यालय अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता के कारण चर्चा में हैं या सम्मान समारोहों के कारण। यही वह बहस है, जिस पर आज नहीं तो कल उच्च शिक्षा जगत को गंभीरता से विचार करना ही होगा।




