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खनिज संपदा पर राज्यों के टैक्स अधिकार होंगे सीमित? लोकसभा में पेश MMDR संशोधन विधेयक में कई बड़े बदलाव

विधेयक में खनिज-युक्त भूमि (mineral-bearing lands) को लेकर केंद्र सरकार की भूमिका बढ़ाने का प्रस्ताव है। इसके तहत केंद्र को ऐसी भूमि के नियमन से जुड़े प्रावधान तय करने का अधिकार देने की बात कही गई है। इसका असर खनिज संसाधनों वाले राज्यों में भूमि और खनन गतिविधियों के नियमन पर पड़ सकता है।

NSI Admin12 Aug 2026, 03:44 AM3 min read
खनिज संपदा पर राज्यों के टैक्स अधिकार होंगे सीमित? लोकसभा में पेश MMDR संशोधन विधेयक में कई बड़े बदलाव

पीयूष पुरोहित की खास रिपोर्ट -

नई दिल्ली, 12 अगस्त। केंद्र सरकार ने खनन क्षेत्र से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाते हुए खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किया है। जिउस पर आज लोकसभा में चर्चा हो सकती है। विधेयक का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में कर एवं शुल्क व्यवस्था को अधिक एकरूप और पूर्वानुमेय बनाना बताया गया है। हालांकि, इसके कुछ प्रावधानों को लेकर केंद्र और राज्यों के अधिकारों का मुद्दा भी चर्चा में आ गया है।

विधेयक में खनिज-युक्त भूमि (mineral-bearing lands) को लेकर केंद्र सरकार की भूमिका बढ़ाने का प्रस्ताव है। इसके तहत केंद्र को ऐसी भूमि के नियमन से जुड़े प्रावधान तय करने का अधिकार देने की बात कही गई है। इसका असर खनिज संसाधनों वाले राज्यों में भूमि और खनन गतिविधियों के नियमन पर पड़ सकता है।

राज्यों के टैक्स और सेस पर नया ढांचा

विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान खनिजों पर राज्यों की ओर से लगाए जाने वाले टैक्स, सेस और अन्य शुल्क से जुड़ा है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत राज्यों को ऐसे शुल्क लगाने की अनुमति होगी, लेकिन उन्हें केंद्र सरकार की ओर से निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अनुरूप रखना होगा।

केंद्र सरकार का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में खनिजों पर अलग-अलग प्रकार के शुल्क और लेवी से खनन कंपनियों की लागत बढ़ती है। इससे निवेश और खनिज उत्पादन प्रभावित हो सकता है। सरकार इसी वजह से खनिज क्षेत्र में एक समान और स्थिर वित्तीय व्यवस्था स्थापित करना चाहती है।

खनिज-युक्त जमीन पर केंद्र की भूमिका बढ़ेगी

विधेयक में केंद्र सरकार को खनिज-युक्त भूमि से संबंधित नियमन के लिए मानक निर्धारित करने का प्रस्ताव है। इससे खनिज संसाधनों की पहचान, नियमन और उनसे जुड़े वित्तीय प्रावधानों में केंद्र की भूमिका मजबूत हो सकती है।

सरकार का कहना है कि इससे खनन क्षेत्र में नियमों को स्पष्ट करने और निवेश के लिए बेहतर माहौल तैयार करने में मदद मिलेगी।

पुराने बकाया मामलों के लिए भी प्रावधान-प्रस्तावित संशोधनों में खनिजों से संबंधित कुछ पुराने बकाया शुल्क और लेवी के मामलों को लेकर भी प्रावधान किए गए हैं। इसका उद्देश्य लंबे समय से चले आ रहे वित्तीय विवादों और अनिश्चितताओं को कम करना है।

राज्यों ने उठाए अधिकारों पर सवाल-विधेयक को लेकर सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल राज्यों के वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों का है। आलोचकों का कहना है कि यदि राज्यों को खनिजों पर टैक्स और सेस लगाने की शक्ति केंद्र द्वारा निर्धारित सीमाओं के अधीन कर दी जाती है, तो खनिज संपदा वाले राज्यों के राजस्व पर असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर, केंद्र का कहना है कि खनन क्षेत्र में अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग लेवी व्यवस्था को तर्कसंगत बनाना जरूरी है। सरकार के मुताबिक इससे निवेश को बढ़ावा मिलेगा, खनिज उत्पादन बढ़ेगा और उद्योग को अधिक स्पष्ट वित्तीय व्यवस्था मिलेगी।

खनन क्षेत्र में निवेश बढ़ाने पर जोर

विधेयक के पीछे सरकार का एक प्रमुख उद्देश्य देश में खनिज उत्पादन और खनन क्षेत्र में निवेश बढ़ाना है। सरकार का मानना है कि शुल्क और कर व्यवस्था में अधिक स्पष्टता आने से कंपनियों के लिए परियोजनाओं की लागत का अनुमान लगाना आसान होगा और नई खनन परियोजनाओं में निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है।

कुल मिलाकर, खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 खनिज-युक्त भूमि के नियमन, राज्यों की खनिज संबंधी लेवी और केंद्र-राज्य अधिकारों के संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण विधायी प्रस्ताव है। अब लोकसभा में इस पर होने वाली बहस के दौरान सरकार और विपक्ष के साथ-साथ खनिज संपदा वाले राज्यों का रुख भी महत्वपूर्ण रहेगा।

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