*पीयूष पुरोहित की खास रिपोर्ट
दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर कल हुए घटनाक्रम ने एक बार फिर देश के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है कि, लोकतंत्र में विरोध का अधिकार कितना व्यापक है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी कहाँ से शुरू होती है ? यह बहस नई नहीं है, लेकिन हर बड़े आंदोलन के बाद फिर से प्रासंगिक हो जाती है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा और सरकार के विरुद्ध अपनी बात रखने का अधिकार देता है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति भी है। लेकिन संविधान किसी भी नागरिक या संगठन को कानून हाथ में लेने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने, पुलिस पर हमला करने, बैरिकेड तोड़ने अथवा प्रतिबंधित क्षेत्रों में जबरन प्रवेश करने की अनुमति नहीं देता। अधिकार और जिम्मेदारी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जब अधिकार जिम्मेदारी से अलग हो जाते हैं, तब लोकतंत्र की जगह अराजकता लेने लगती है।

संसद भवन भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च प्रतीक
संसद भवन केवल एक सरकारी इमारत नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च प्रतीक है। इसकी सुरक्षा किसी भी सरकार की सर्वोच्च संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। यदि कोई भीड़ संसद की ओर बढ़ती है, सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास करती है या प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करना चाहती है, तो सुरक्षा एजेंसियों के सामने केवल दो विकल्प नहीं होते—या तो रोकें या फिर किसी संभावित बड़ी सुरक्षा चूक का जोखिम उठाएँ। ऐसी स्थिति में पुलिस और सुरक्षा बलों का दायित्व है कि वे कानून के अनुरूप आवश्यक कदम उठाएँ।
भीड़ नियंत्रण की एक स्थापित प्रक्रिया
भीड़ यानि आंदोलन उपजे बड़े समूह को नियंत्रण की एक स्थापित प्रक्रिया होती है। पहले समझाइश,बार-बार चेतावनी, बैरिकेड लगाए जाते हैं, वैकल्पिक मार्ग सुझाए जाते हैं और प्रदर्शनकारियों से संयम बरतने की अपील की जाती है। यदि इसके बावजूद भीड़ उग्र हो जाए, पुलिस पर पथराव करे, बैरिकेड तोड़ दे या संवेदनशील क्षेत्र की ओर बढ़े, तो कानून पुलिस को आवश्यक और अनुपातिक बल प्रयोग की अनुमति देता है। लाठीचार्ज या अन्य भीड़ नियंत्रण उपाय सामान्यतः अंतिम विकल्प माने जाते हैं, न कि पहला। कल जंतर मंतर में भी पुलिस ने ऐसा ही किया ।अनयंत्रित भीड़ उग्र होने पर उसे तीतर बितर करने के लिए आख़री उपाय हाथ में मजबूरन लिया गया।

तो जवाब देही किसकी !
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यदि पुलिस कोई कार्रवाई न करे और उग्र भीड़ संसद परिसर तक पहुँच जाए, तब इसका जवाबदेह कौन होगा ? ऐसी स्थिति में सबसे पहले पुलिस और सरकार की कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठेंगे। इसलिए कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व केवल कागज़ी नहीं, बल्कि व्यावहारिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी है।
आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत नैतिकता-
लोकतंत्र में आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी नैतिकता होती है। इतिहास गवाह है कि जिन आंदोलनों ने शांति, अनुशासन और अहिंसा का मार्ग अपनाया, उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिला। वहीं, जैसे ही आंदोलन हिंसा, तोड़फोड़ या टकराव का रूप लेते हैं, उनका मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है और चर्चा केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित रह जाती है।
विपक्ष का अधिकार है शासन की आलोचना करना -
हाल की घटना के बाद विपक्ष के कई नेताओं—जिनमें राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं—ने पुलिस कार्रवाई की आलोचना की और इसे युवाओं के प्रति कठोर रवैया बताया। लोकतंत्र में विपक्ष का यह अधिकार है कि वह सरकार से जवाब मांगे, गलत कार्रवाई पर सवाल उठाए और यदि उसे लगता है कि कहीं अति हुई है तो निष्पक्ष जांच की मांग करे।
लेकिन इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह प्रश्न केवल किसी एक दल या सरकार का नहीं है। यदि भविष्य में किसी अन्य राजनीतिक दल की सरकार केंद्र में हो और उसके सामने भी यही परिस्थिति आए—जहाँ बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए संसद की ओर बढ़ रहे हों—तो क्या वह सरकार- पुलिस को मूकदर्शक बने रहने का निर्देश देगी ? या फिर वह भी संसद और कानून-व्यवस्था की रक्षा के लिए वही कदम उठाएगी जो उस समय आवश्यक समझे जाएँगे ?
यह एक वैध सार्वजनिक प्रश्न है, लेकिन इसका उत्तर परिस्थितियों, उपलब्ध तथ्यों और कानून के अनुसार ही दिया जाना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से। राजनीति में सत्ता और विपक्ष की भूमिकाएँ समय के साथ बदलती रहती हैं, लेकिन शासन की संवैधानिक जिम्मेदारियाँ नहीं बदलतीं। जो दल आज विपक्ष में है, वह कल सत्ता में हो सकता है, और जो आज सत्ता में है, वह भविष्य में विपक्ष में बैठ सकता है। इसलिए कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर दोहरे मानदंड लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करते हैं।
पुलिस और प्रशासन की भी जवाबदेही कम नहीं
दूसरी ओर, पुलिस और प्रशासन की भी जवाबदेही कम नहीं है। बल प्रयोग यदि आवश्यक हो, तो वह न्यूनतम, अनुपातिक और कानून के अनुरूप होना चाहिए। यदि कहीं अत्यधिक बल प्रयोग, मानवाधिकारों का उल्लंघन या प्रक्रिया में त्रुटि हुई हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस भी कानून से ऊपर नहीं है। आंदोलन करने वाले संगठनों और राजनीतिक दलों की भी समान जिम्मेदारी है कि वे अपने समर्थकों को कानून का सम्मान करने, प्रशासन के साथ समन्वय बनाए रखने और किसी भी प्रकार की हिंसा या उकसावे से दूर रहने के लिए प्रेरित करें। आंदोलन की सफलता केवल भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि उसके अनुशासन और नैतिक बल से तय होती है। लोकतंत्र की मजबूती विरोध और शासन—दोनों के संतुलन में है। सरकार को आलोचना स्वीकार करनी चाहिए और नागरिकों को विरोध का अधिकार जिम्मेदारी के साथ प्रयोग करना चाहिए। न तो हिंसक भीड़ लोकतंत्र को मजबूत कर सकती है और न ही अनावश्यक दमन। दोनों ही लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता में कौन है और विपक्ष में कौन। असली प्रश्न यह है कि क्या हम लोकतंत्र में अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी सम्मान करेंगे ? यदि उत्तर 'हाँ' है, तो विरोध भी होगा, असहमति भी होगी, लेकिन कानून और संविधान की मर्यादा के भीतर। यही किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान है।


