धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल शुरुआत है, असली परीक्षा अब शिक्षा व्यवस्था सुधार की
*पीयूष पुरोहित की विशेष टिप्पणी
नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने देश की राजनीति, शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक विमर्श को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। पिछले कई महीनों से देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं, पेपर लीक, परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य को लेकर उठ रहे सवाल आखिरकार उस मुकाम तक पहुंच गए, जहां सरकार को राजनीतिक स्तर पर बड़ा निर्णय लेना पड़ा। यह घटनाक्रम केवल एक मंत्री के पद छोड़ने की घटना नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में जनता की आवाज, छात्र शक्ति और राजनीतिक जवाबदेही के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने वाला क्षण भी माना जा सकता है।
देश में जब भी कोई बड़ा जनांदोलन खड़ा हुआ है, उसकी जड़ में आम नागरिकों की पीड़ा और व्यवस्था से जुड़ी नाराजगी रही है। इस बार भी स्थिति कुछ अलग नहीं थी। लाखों छात्र, जिन्होंने वर्षों तक दिन-रात मेहनत कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, उन्हें बार-बार ऐसे समाचारों का सामना करना पड़ा जिनमें पेपर लीक, परीक्षा माफिया, नकल गिरोह और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं की चर्चा थी।
हर बार परीक्षा रद्द होने, दोबारा परीक्षा कराने या जांच की घोषणा ने छात्रों की मानसिक, आर्थिक और सामाजिक परेशानियों को और बढ़ाया। कई युवाओं ने अपनी आयु सीमा का एक हिस्सा इन प्रक्रियाओं में गंवा दिया, तो अनेक परिवारों पर कोचिंग, आवास और तैयारी का आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता गया।
यही कारण था कि यह आंदोलन किसी एक परीक्षा या किसी एक राज्य का मुद्दा बनकर नहीं रह गया। धीरे-धीरे यह देशभर के युवाओं की उस सामूहिक भावना का प्रतीक बन गया, जिसमें वे निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली की मांग कर रहे थे। सोशल मीडिया से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों तक और सड़कों से लेकर संसद तक यह मुद्दा लगातार चर्चा का केंद्र बना रहा। छात्र संगठनों ने रैलियां निकालीं, अभ्यर्थियों ने शांतिपूर्ण धरने दिए और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी इस मांग का समर्थन किया। विपक्षी दलों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया, जबकि सरकार पर लगातार जवाब देने का दबाव बढ़ता गया।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि जनता की आवाज अंततः सत्ता तक पहुंचती है। जब किसी मुद्दे पर व्यापक जनसमर्थन तैयार हो जाता है, तब सरकारों को भी निर्णय लेने पड़ते हैं। शिक्षा मंत्री का इस्तीफा इसी लोकतांत्रिक दबाव का परिणाम माना जा रहा है। राजनीतिक दृष्टि से यह सरकार की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का संकेत हो सकता है, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से यह केवल पहला कदम है। क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है, जिसमें बार-बार ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं।
इतिहास बताता है कि केवल नेतृत्व परिवर्तन से व्यवस्थाएं नहीं बदलतीं। यदि संस्थागत सुधार नहीं किए जाएं तो वही समस्याएं नए चेहरों के साथ दोबारा सामने आ जाती हैं। इसलिए अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी नई नेतृत्व टीम और सरकार पर है कि वह शिक्षा प्रणाली में ऐसे स्थायी सुधार करे, जिनसे भविष्य में किसी भी परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल न उठे।
इसके लिए सबसे पहले परीक्षा संचालन से जुड़ी संस्थाओं को तकनीकी रूप से और अधिक मजबूत बनाना होगा। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उनकी सुरक्षित छपाई, परिवहन, डिजिटल एन्क्रिप्शन, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सुरक्षा तंत्र और साइबर सुरक्षा जैसे उपायों को प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही परीक्षा माफिया, संगठित अपराध और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ समयबद्ध जांच और कठोर दंड सुनिश्चित करना होगा। जब तक अपराधियों को शीघ्र और कड़ी सजा नहीं मिलेगी, तब तक व्यवस्था पर जनता का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हो सकेगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था केवल परीक्षा केंद्रित होकर रह गई है? आज करोड़ों युवा वर्षों तक केवल एक परीक्षा की तैयारी में अपना समय, ऊर्जा और संसाधन लगा देते हैं। यदि वह परीक्षा विवादों में घिर जाती है, तो केवल परिणाम ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि युवाओं का आत्मविश्वास भी टूटता है। इसलिए शिक्षा और भर्ती प्रक्रिया में सुधार के साथ-साथ रोजगार के अवसर बढ़ाने, चयन प्रक्रियाओं को समयबद्ध बनाने और अभ्यर्थियों को मानसिक एवं प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध कराने की दिशा में भी गंभीर प्रयास आवश्यक हैं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो आने वाले समय में यह मुद्दा संसद से लेकर चुनावी मंचों तक प्रमुखता से उठता रहेगा। विपक्ष इसे छात्रों की जीत और सरकार की जवाबदेही के रूप में प्रस्तुत करेगा, जबकि सरकार शिक्षा क्षेत्र में सुधारों की नई पहल के माध्यम से विश्वास बहाल करने का प्रयास करेगी। लेकिन इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पूरे आंदोलन का केंद्र कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि देश का युवा है। उसकी सबसे बड़ी अपेक्षा केवल इतनी है कि उसकी मेहनत का उचित मूल्य मिले और उसे निष्पक्ष अवसर प्राप्त हो।
इस आंदोलन ने यह भी साबित किया है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से किया गया संघर्ष प्रभावी हो सकता है। छात्रों ने व्यापक स्तर पर अपनी बात रखी, समाज का समर्थन प्राप्त किया और अंततः सरकार को निर्णय लेने के लिए बाध्य किया। यह लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है। लेकिन लोकतंत्र की सफलता केवल विरोध दर्ज कराने में नहीं, बल्कि उस विरोध के परिणामस्वरूप स्थायी सुधार लागू करने में निहित होती है।
आज आवश्यकता किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराकर आगे बढ़ जाने की नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था का आत्ममंथन करने की है। यदि यह अवसर भी केवल राजनीतिक बयानबाजी, आरोप-प्रत्यारोप और चुनावी विमर्श तक सीमित रह गया, तो आने वाली पीढ़ियां फिर उसी समस्या का सामना करेंगी।
हालांकि इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छात्र हैं। उनके लिए न तो राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप प्राथमिक हैं और न ही किसी दल की जीत या हार। उनकी सबसे बड़ी अपेक्षा एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था है, जिसमें मेहनत का सम्मान हो, प्रतिभा को अवसर मिले और किसी भी प्रकार की अनियमितता के लिए कोई स्थान न हो। देश का युवा केवल आश्वासन नहीं, बल्कि परिणाम चाहता है।
इतिहास गवाह है कि कई बड़े सामाजिक और नीतिगत बदलाव युवाओं के आंदोलनों से ही शुरू हुए हैं। यदि यह आंदोलन भी शिक्षा व्यवस्था में स्थायी सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की मजबूत नींव रखता है, तो इसे लोकतंत्र की सकारात्मक उपलब्धि माना जाएगा। लेकिन यदि यह घटनाक्रम केवल राजनीतिक बहस और सत्ता परिवर्तन तक सीमित रह गया, तो करोड़ों छात्रों की उम्मीदों को फिर एक बार निराशा का सामना करना पड़ सकता है।
अंततः किसी मंत्री का इस्तीफा लोकतंत्र में जवाबदेही का एक पड़ाव हो सकता है, मंजिल नहीं। असली जीत तब होगी, जब देश का प्रत्येक छात्र यह विश्वास कर सके कि उसकी मेहनत, योग्यता और भविष्य किसी पेपर लीक, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक लापरवाही की भेंट नहीं चढ़ेगा। शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता ही इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि और लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।



