नई दिल्ली। आज पूरे देश में श्रद्धा, आस्था और सम्मान के साथ गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है। यह दिन गुरु और शिष्य के पवित्र संबंध को समर्पित है। हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवसर पर लोग अपने गुरुजनों का सम्मान करते हैं, उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।भारतीय परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना गया है। मान्यता है कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने वेदों का संकलन तथा महाभारत सहित अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की थी। इसी कारण गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है और इस दिन महर्षि वेदव्यास का विशेष पूजन किया जाता है। देशभर के मंदिरों, आश्रमों, गुरुकुलों और धार्मिक संस्थानों में विशेष पूजा-अर्चना, सत्संग, भजन-कीर्तन और प्रवचन का आयोजन किया जा रहा है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने आध्यात्मिक गुरुओं के दर्शन कर आशीर्वाद ले रहे हैं। कई स्थानों पर गुरु-पूजन के साथ सेवा, दान और भंडारों का भी आयोजन किया गया है।
बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए भी यह दिन विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद इसी दिन सारनाथ में अपने प्रथम पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था, जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है।
शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और सांस्कृतिक मंचों पर भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। विद्यार्थी अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान व्यक्त कर रहे हैं और उनके योगदान को याद कर रहे हैं।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक होता है। गुरु के ज्ञान और संस्कार ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है।
गुरु पूर्णिमा का यह पर्व समाज को ज्ञान, विनम्रता, अनुशासन और संस्कारों के महत्व का संदेश देता है तथा गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देता है।





