एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड)। कॉमनवेल्थ गेम्स के दूसरे दिन भारतीय खिलाड़ियों ने कई खेलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए पदकों की उम्मीदों को और मजबूत किया। दिन की सबसे बड़ी उपलब्धि पैरा पावरलिफ्टिंग में मिली, जहां भारत के झंडू कुमार ने पुरुषों के हैवीवेट वर्ग में कांस्य पदक जीतकर देश का पहला पदक दिलाया। इसके अलावा तैराकी, मुक्केबाजी और लॉन बॉल्स में भी भारतीय खिलाड़ियों ने दमदार प्रदर्शन किया। हालांकि कुछ खिलाड़ी बेहद मामूली अंतर से पदक जीतने से चूक गए, लेकिन उनके प्रदर्शन ने आगामी मुकाबलों के लिए उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
संघर्ष से सफलता तक का सफर-बिहार के एक किसान परिवार से आने वाले 28 वर्षीय झंडू कुमार की सफलता लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। बचपन में पोलियो से प्रभावित होने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने परिवार का सहारा बनने के लिए सब्जियां बेचीं और बाद में ऑटो रिक्शा चलाकर जीवनयापन किया। कठिन परिस्थितियों के बीच भी उन्होंने खेल के प्रति अपना जुनून बनाए रखा और लगातार अभ्यास करते रहे।
उनकी मेहनत का परिणाम अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर देखने को मिला, जब उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया। पदक जीतने के बाद झंडू कुमार ने इसे अपने परिवार, कोच और देशवासियों को समर्पित किया।
अन्य खेलों में भी भारत का दमदार प्रदर्शन-तैराकी प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ियों ने अपने व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए कई स्पर्धाओं के फाइनल में जगह बनाई। मुक्केबाजी में भारतीय मुक्केबाजों ने शुरुआती मुकाबलों में प्रभावशाली जीत दर्ज कर अगले दौर में प्रवेश किया। वहीं लॉन बॉल्स में भारतीय टीम ने शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए पदक की दौड़ में अपनी मजबूत दावेदारी बनाए रखी। कुछ स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ी चौथे स्थान पर रहे और बेहद कम अंतर से पदक जीतने से चूक गए। बावजूद इसके उनके प्रदर्शन को सकारात्मक माना जा रहा है।
आगे और पदकों की उम्मीद-भारतीय दल को आने वाले दिनों में मुक्केबाजी, कुश्ती, बैडमिंटन, एथलेटिक्स, निशानेबाजी और पैरा स्पर्धाओं से कई पदकों की उम्मीद है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि दूसरे दिन के प्रदर्शन से खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ा है और आने वाले मुकाबलों में भारत का पदक तालिका में स्थान और बेहतर हो सकता है।
झंडू कुमार का कांस्य पदक न केवल भारत के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स का पहला पदक बना, बल्कि यह इस बात का भी प्रतीक है कि कठिन संघर्ष और दृढ़ संकल्प के दम पर किसी भी चुनौती को सफलता में बदला जा सकता है।





