पीयूष पुरोहित की रिपोर्ट
नई दिल्ली। वर्ष 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात अभी से बिछने लगी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और कांग्रेस के नेतृत्व वाला INDIA गठबंधन अपनी-अपनी रणनीतियों को मजबूत करने में जुटे हैं। 2024 के चुनाव में BJP को अपने दम पर बहुमत नहीं मिला था, लेकिन NDA ने सहयोगियों के साथ सरकार बनाई। दूसरी ओर, कांग्रेस ने 99 सीटें जीतकर अपनी संसदीय स्थिति में सुधार किया, मगर विपक्षी गठबंधन के सामने राज्यों में संगठन मजबूत करने और सहयोगियों के साथ तालमेल बनाए रखने की चुनौती बनी हुई है।
2029 का चुनाव केवल दो गठबंधनों की सीटों की लड़ाई नहीं होगा। इसमें प्रधानमंत्री की छवि, सरकार के कामकाज, महंगाई, रोजगार, सामाजिक समीकरण, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और क्षेत्रीय दलों की भूमिका जैसे मुद्दे भी अहम रहेंगे।
SIR: मतदाता सूची का पुनरीक्षण विपक्ष के लिए राजनीतिक मुद्दा !
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम हटने का खतरा है और इससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। विपक्ष, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर आर पार के मूड में है। सड़क संसद और बाद में कोर्ट में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और अन्य 9 विपक्षी दलों के नेता रीट पीटिशन दायर की है। जिस पर सुनवाई चल रही है।
राजनीतिक दृष्टि से SIR कांग्रेस और INDIA गठबंधन के लिए एक बड़ा अभियान है। यदि विपक्ष पात्र मतदाताओं के नाम हटने से संबंधित मामलों के ठोस प्रमाण प्रस्तुत करता है, तो वह पारदर्शिता और मताधिकार का सवाल उठा सकता है। लेकिन केवल आरोपों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि SIR किसी एक पार्टी को चुनावी लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। इस मुद्दे का राजनीतिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि शिकायतों का निस्तारण कैसे होता है और पात्र मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा कितनी प्रभावी ढंग से होती है।
सरकार मजबूती से खड़ी है चुनाव आयोग के साथ
उधर विपक्ष के SIR के मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयोग के इस्तीफे और उनको जेल भेजने के बयानों के बीच केंद्र की मोदी सरकार चुनाव आयोग के साथ मजबूती के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। खुद गृहमंत्री अमित शाह मीडिया के सामने आकर कहा कि -राहुल गाँधी का SIR मुद्दा असल में भारत में अवैध रूप से रह रहे घुसपेठियों को बचने की एक कोशिश है। जिसे देश की जनता समझ चुकी है।
मोदी की छवि BJP के लिए अहम राजनीतिक पूंजी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत नेतृत्वकर्ता और निर्णायक प्रशासक की छवि BJP की राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण आधार रही है। उनके समर्थक उन्हें स्थिर नेतृत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की भूमिका से जोड़ते हैं। BJP 2029 के चुनाव में भी इस छवि और केंद्र सरकार की योजनाओं को अपने अभियान का प्रमुख हिस्सा बना सकती है।
हालांकि, किसी नेता की छवि अपने आप चुनावी जीत की गारंटी नहीं होती। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं। प्रधानमंत्री के प्रति सकारात्मक धारणा के साथ-साथ सरकार के प्रदर्शन का आकलन भी चुनावी परिणामों में महत्वपूर्ण रहेगा।
जनवरी 2026 के इंडिया टुडे–CVoter सर्वेक्षण में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए पसंदीदा नेता मानने वाले उत्तरदाताओं का अनुपात राहुल गांधी से अधिक था। यह एक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है, चुनाव परिणाम नहीं; 2029 तक राजनीतिक परिस्थितियां और मतदाताओं की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।
कांग्रेस की चुनौती: राष्ट्रीय मुद्दे मजबूत, लेकिन राज्यों में गठबंधन कमजोर

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक अभियान को राज्यस्तरीय संगठन और चुनावी सफलता में बदलना है। 2024 में पार्टी ने 99 लोकसभा सीटें जीतीं, लेकिन अलग-अलग राज्यों में उसके प्रदर्शन और सहयोगियों के साथ संबंधों में काफी अंतर रहा।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने विपक्षी प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) के साथ कांग्रेस ने चुनाव लड़ा। तमिलनाडु में कांग्रेस और DMK लंबे समय तक सहयोगी रहे, जबकि अन्य राज्यों में सीटों के बंटवारे और नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आते रहे।
2026 के विधानसभा चुनावों के बाद क्षेत्रीय राजनीति में नए बदलाव हुए। तमिलनाडु में कांग्रेस ने TVK के साथ राजनीतिक समझ बनाई, जबकि DMK के साथ उसके संबंधों में तनाव आया। AAP की INDIA गठबंधन से दूरी ने भी विपक्षी समन्वय की चुनौती बढ़ाई। इन घटनाओं से संकेत मिलता है कि कांग्रेस के लिए केवल राष्ट्रीय स्तर पर साझा मंच बनाना पर्याप्त नहीं होगा; उसे प्रत्येक राज्य में सीट बंटवारे, नेतृत्व और संगठन के प्रश्न सुलझाने होंगे।
कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं इस बात पर निर्भर करेंगी कि वह सहयोगियों को साथ रख पाती है या नहीं, नए क्षेत्रों में अपना संगठन मजबूत करती है या नहीं और स्थानीय मुद्दों पर मतदाताओं का भरोसा हासिल कर पाती है या नहीं।
क्षेत्रीय दल: कांग्रेस की ताकत भी और चुनौती भी
INDIA गठबंधन में समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, DMK, राष्ट्रीय जनता दल, झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इन दलों का अपने-अपने राज्यों में स्वतंत्र जनाधार है। इसलिए कांग्रेस के लिए गठबंधन सहयोगियों की ताकत चुनावी लाभ में बदल सकती है।
लेकिन यही व्यवस्था एक चुनौती भी है। क्षेत्रीय दल कई बार अपने राज्यों में कांग्रेस के साथ सीटों के बंटवारे पर सहमत नहीं होते या राष्ट्रीय रणनीति से अलग राजनीतिक रास्ता अपनाते हैं। यदि गठबंधन के दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं, तो कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में विपक्षी मतों के विभाजन की संभावना बढ़ सकती है। दूसरी ओर, जहां मजबूत और व्यावहारिक गठबंधन बनता है, वहां संयुक्त चुनावी रणनीति का लाभ भी मिल सकता है।
2029 के लिए कांग्रेस की सबसे बड़ी संगठनात्मक परीक्षा यही होगी कि वह सहयोगियों पर निर्भर रहने के साथ-साथ अपना स्वतंत्र जनाधार भी बढ़ाए।
NDA के सामने भी चुनौतियां कम नहीं
BJP को 2024 में 240 सीटें मिली थीं, जबकि NDA ने सहयोगियों के साथ कुल 293 सीटें हासिल कीं। इससे स्पष्ट हुआ कि राष्ट्रीय स्तर पर BJP की प्रमुख स्थिति के बावजूद सहयोगियों का समर्थन सरकार बनाने के लिए महत्वपूर्ण था। तेलुगु देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगियों की भूमिका केंद्र की राजनीति में अहम रही है। 2029 में NDA के लिए सहयोगियों के साथ तालमेल बनाए रखना, सीटों का उचित बंटवारा करना और राज्यों में स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के अनुरूप रणनीति तैयार करना जरूरी होगा।
BJP को अपनी सरकार के कामकाज, नेतृत्व की छवि और संगठनात्मक क्षमता के आधार पर मतदाताओं के सामने जाना होगा। साथ ही, रोजगार, महंगाई, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया भी चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। 2024 में BJP की सीटें 303 से घटकर 240 रह गई थीं; इसलिए उसके पिछले प्रदर्शन को भविष्य की सफलता की निश्चित गारंटी नहीं माना जा सकता।

मोदी को NDA की एकजुटता महत्वपूर्ण
2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है और उसके नतीजों के बारे में निश्चित दावा करना संभव नहीं है। फिर भी मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से स्पष्ट है कि BJP के लिए मोदी की नेतृत्व छवि, सरकार का प्रदर्शन और NDA की एकजुटता महत्वपूर्ण होंगे। कांग्रेस के लिए SIR जैसे मुद्दों पर अभियान चलाना राजनीतिक अवसर बन सकता है, लेकिन उसे आरोपों के साथ प्रमाण, पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों की रक्षा से जुड़ी ठोस मांगें भी रखनी होंगी।
कांग्रेस के लिए गठबंधन के साथ संगठन मजबूत करना जरूरी
कांग्रेस की उम्मीदें क्षेत्रीय सहयोगियों के प्रदर्शन से जुड़ी रहेंगी, लेकिन केवल सहयोगियों के सहारे राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत विकल्प बनना कठिन होगा। पार्टी को अपने संगठन, स्थानीय नेतृत्व और स्वतंत्र जनाधार को भी मजबूत करना होगा।
2029 में किन मुद्दों पर बन सकता है चुनावी विमर्श?
आगामी चुनाव में कई विषय राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन सकते हैं:
नेतृत्व और सरकार का प्रदर्शन: मोदी की छवि, केंद्र सरकार की योजनाएं और उनके वास्तविक परिणाम।
SIR और मतदाता सूची: पात्र मतदाताओं के नाम, पारदर्शिता और निर्वाचन प्रक्रिया पर भरोसा।
महंगाई और रोजगार: युवाओं के अवसर, आय, किसानों की स्थिति और घरेलू खर्च।
विपक्षी एकता: कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच सीटों का बंटवारा तथा साझा अभियान।
राज्यस्तरीय संगठन: BJP और कांग्रेस की जमीनी पहुंच, उम्मीदवारों का चयन और स्थानीय नेतृत्व।
सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण: जाति, समुदाय, ग्रामीण-शहरी अंतर और राज्यों की अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं।
इन मुद्दों का महत्व राज्यों और निर्वाचन क्षेत्रों के अनुसार अलग हो सकता है। कोई एक राष्ट्रीय मुद्दा सभी जगह समान प्रभाव डालेगा, ऐसा मानना उचित नहीं होगा।





