March 12, 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्राओं में एक स्पष्ट रणनीतिक और सांस्कृतिक संदेश छिपा हुआ होता है। ऐसा ही संदेश प्रधानमंत्री की तमिलनाडु यात्रा में भी छिपा है। हम आपको याद दिला दें कि इस साल अप्रैल में श्रीलंका से लौटते समय प्रधानमंत्री सीधे रामेश्वरम पहुँचे थे और अब मालदीव से लौटते समय सीधे तमिलनाडु के तूतीकोरिन और त्रिची आ रहे हैं, जहाँ वह चोल सम्राट राजेन्द्र प्रथम की जयंती उत्सव और आदि तिरुवाथिरै महोत्सव में भाग लेंगे। यह यात्रा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उपस्थिति भर नहीं है, बल्कि तमिलनाडु और दक्षिण भारत की राजनीति में एक बड़ा संकेत है।
सबसे पहले रामेश्वरम की बात करें तो आपको बता दें कि यह स्थल रामायण और श्रीराम से जुड़ा है जोकि धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व रखता है। प्रधानमंत्री का वहां जाना दक्षिण भारत में हिंदू आस्था के प्रमुख केंद्रों को सशक्त करने का प्रयास माना गया। वहीं त्रिची में चोल सम्राट राजेन्द्र प्रथम की जयंती उत्सव में प्रधानमंत्री की उपस्थिति तमिल गौरव और चोल इतिहास को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करने का संदेश देती है। यह दिखाता है कि केंद्र सरकार तमिल संस्कृति और इतिहास को भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में प्रस्तुत कर रही है।


प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्राएँ यह संदेश देती हैं कि तमिलनाडु का इतिहास और संस्कृति राष्ट्रीय गौरव का हिस्सा है, न कि उससे अलग। चोल सम्राट राजेन्द्र प्रथम जैसे ऐतिहासिक नायकों को राष्ट्रीय विमर्श में लाना, DMK के तमिल गौरव के नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश भी है। इसके अलावा, त्रिची यात्रा के साथ-साथ प्रधानमंत्री तमिलनाडु के तूतीकोरिन में ₹4,800 करोड़ से अधिक की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन भी कर रहे हैं। इससे यह संदेश जाता है कि सांस्कृतिक गौरव और आर्थिक प्रगति एक-दूसरे के पूरक हैं। भाजपा इस संतुलन को दिखाकर तमिलनाडु की जनता को यह विश्वास दिलाना चाहती है कि केंद्र सरकार क्षेत्रीय विकास और सांस्कृतिक सम्मान दोनों पर ध्यान दे रही है। हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री गंगैकोंडाचोलपुरम में सम्राट राजेन्द्र चोल प्रथम की जयंती मनाने और “आदि तिरुवाथिरै” महोत्सव में शामिल होने के साथ ही राजेन्द्र चोल प्रथम पर एक स्मारक सिक्का जारी करेंगे। यह समारोह चोल साम्राज्य की समुद्री विजय के 1000 वर्ष पूरे होने और गंगैकोंडाचोलपुरम मंदिर के निर्माण की स्मृति में आयोजित हो रहा है।

जहां तक यह सवाल है कि क्यों DMK और BJP चोल सम्राट राजेन्द्र प्रथम को लेकर आमने-सामने हैं तो आपको बता दें कि भारतीय राजनीति में इतिहास और प्रतीकों का इस्तेमाल नया नहीं है। लेकिन यहां असली सवाल यह है कि आखिर एक हज़ार वर्ष पूर्व के इस महान चोल सम्राट के नाम और योगदान को लेकर इतनी खींचतान क्यों? सवाल यह भी है कि इसके राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मायने क्या हैं?
हम आपको बता दें कि राजेन्द्र प्रथम चोल साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली शासकों में गिने जाते हैं। राजेन्द्र प्रथम (1014–1044 ई.) को दक्षिण भारत का सबसे महान समुद्री विजेता माना जाता है। उन्होंने श्रीलंका, मालदीव, बर्मा (म्यांमार), थाईलैंड और कंबोडिया तक अपना प्रभाव बढ़ाया। गंगा जल लेकर चोल राजधानी में अभिषेक करने वाली उनकी उपलब्धि उन्हें “गंगैकोंडा चोल” की उपाधि दिलाती है। उनके शासनकाल में प्रशासनिक, सांस्कृतिक और समुद्री व्यापारिक नेटवर्क का जबरदस्त विस्तार हुआ। इसके अलावा, राजेन्द्र प्रथम केवल सैन्य शक्ति का प्रतीक नहीं थे, बल्कि सांस्कृतिक और स्थापत्य कला के भी बड़े संरक्षक थे। तंजावुर और गंगैकोंडाचोलपुरम के भव्य मंदिर उनकी धार्मिक सहिष्णुता और स्थापत्य कौशल को दर्शाते हैं। गंगैकोंडाचोलपुरम मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और तमिल शैव भक्ति परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है।

देखा जाये तो DMK के लिए राजेन्द्र प्रथम तमिल गौरव और द्रविड़ संस्कृति के प्रतीक हैं। पार्टी लंबे समय से यह तर्क देती रही है कि तमिल सभ्यता का इतिहास बेहद समृद्ध है और इसे उत्तर भारत केंद्रित ऐतिहासिक आख्यानों में दबा दिया गया। DMK चाहती है कि तमिल लोगों को यह एहसास हो कि उनके पूर्वजों ने समुद्र पार साम्राज्य खड़ा किया था। इसके अलावा DMK इस विषय को ब्राह्मणवादी इतिहास लेखन के प्रतिरोध के रूप में भी प्रस्तुत करती है। द्रविड़ आंदोलन के सामाजिक न्याय और जातिगत असमानताओं को चुनौती देने के एजेंडे के साथ, राजेन्द्र प्रथम का तमिल गौरव पार्टी के राजनीतिक विमर्श में मजबूती से फिट बैठता है।

दूसरी ओर, BJP की रणनीति थोड़ी अलग है। पार्टी राजेन्द्र प्रथम को “हिंदू साम्राज्यवादी शक्ति” के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिसने विदेशी ताकतों को परास्त कर भारत की सीमाओं के बाहर भी हिंदू प्रभाव फैलाया। यह नैरेटिव BJP की व्यापक “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” की सोच से जुड़ता है। इसके अलावा BJP तमिलनाडु में अपनी जड़ें मजबूत करना चाहती है, जहां अब तक उसकी उपस्थिति सीमित रही है। DMK के तमिल गौरव को चुनौती देने के लिए BJP ऐतिहासिक नायकों को हिंदुत्व के चश्मे से प्रस्तुत कर रही है। इससे उसे तमिलनाडु में सांस्कृतिक जुड़ाव बनाने का अवसर मिलता है।

दोनों दलों की खींचतान के निहितार्थ पर गौर करें तो DMK तमिल पहचान और द्रविड़ गौरव पर जोर देती है, जबकि BJP हिंदू पहचान और राष्ट्रीय गौरव पर। इसके अलावा, यह लड़ाई केवल अतीत की स्मृतियों की नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए इतिहास को परिभाषित करने की भी है। यह भी देखने में आ रहा है कि BJP दक्षिण भारत में पैर जमाने के लिए क्षेत्रीय प्रतीकों को अपनाने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि DMK इस क्षेत्रीय अस्मिता को बचाने की कोशिश में है।

चोल सम्राट राजेन्द्र प्रथम की विरासत पर चल रही यह खींचतान बताती है कि इतिहास केवल अतीत का विषय नहीं है, बल्कि वर्तमान की राजनीति का हथियार भी बनता है। DMK और BJP दोनों ही राजेन्द्र प्रथम को अपने-अपने वैचारिक ढांचे में फिट करने की कोशिश कर रहे हैं। यह संघर्ष आने वाले समय में तमिलनाडु की राजनीति को और अधिक वैचारिक और सांस्कृतिक बहसों से भर देगा।

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तूतीकोरिन से गंगैकोंडाचोलपुरम तक का यह दौरा विकास और सांस्कृतिक प्रतीकवाद का एक संतुलित उदाहरण है। एक ओर वे दक्षिण तमिलनाडु को बड़ी बुनियादी परियोजनाओं का तोहफा दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर तमिल इतिहास और पहचान के सबसे गौरवशाली अध्यायों में से एक, चोल सम्राट राजेन्द्र प्रथम की स्मृति को सम्मानित कर रहे हैं। यह कदम तमिलनाडु की राजनीति में भाजपा की पकड़ मजबूत करने और क्षेत्रीय अस्मिता को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रयास माना जा सकता है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)

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