
नई दिल्ली, 31 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम) के तहत दोषी ठहराए गए एक युवक को बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मामला “वासना” का नहीं, बल्कि “प्रेम” का था। बेंच ने जोर देकर कहा कि कानून कठोर हो सकता है, लेकिन न्याय के हित में उसे परिस्थितियों के अनुरूप “झुकना” होगा। यह फैसला किशोरावस्था के प्रेम संबंधों को POCSO के दुरुपयोग से बचाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, जहां तकनीकी अपराध को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पर बल दिया गया।
मामला का पूरा क्या ?
यह मामला 2022 का है, जब 17 वर्षीय एक लड़की और उसके 19 वर्षीय प्रेमी (आरोपी) ने घर से भागकर विवाह कर लिया था। लड़की के परिवार ने शिकायत दर्ज कराई, जिसमें POCSO की धारा 6 (बाल यौन अपराध) और 8 (यौन उत्पीड़न) के तहत मामला दर्ज किया गया।
निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई, जबकि सेशन कोर्ट ने इसे बरकरार रखा। आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जहां उसकी पत्नी (अब विवाहित) ने भी दया याचिका दायर की।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच—जस्टिस ए.एस. बोपन्ना और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने सुनवाई के दौरान मामले की गहन जांच की। अदालत ने माना कि आरोपी की उम्र भी नाबालिग के करीब थी (19 वर्ष), और संबंध सहमति पर आधारित थे। कोई जबरदस्ती या यौन शोषण का साक्ष्य नहीं मिला।
बेंच ने कहा, “यह अपराध वासना का नहीं, प्रेम का परिणाम था। तकनीकी रूप से दोषी हो सकता है, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए सजा न्यायसंगत नहीं होगी।” कोर्ट ने आरोपी की पत्नी की याचिका पर सहानुभूति जताते हुए कहा, “पत्नी ने अदालत से दया और संवेदना की गुहार लगाई है।
“अदालत ने POCSO कानून की कठोरता पर चिंता जताई, जो नाबालिगों के बीच प्रेम को भी अपराध बना देता है। बेंच ने टिप्पणी की, “कानून बच्चों की रक्षा के लिए है, लेकिन किशोर प्रेम को दंडित करना न्याय के विरुद्ध है। न्याय के लिए कानून को झुकना होगा।” कोर्ट ने आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया और मामले को बंद कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
POCSO का दुरुपयोग न हो यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने POCSO के दुरुपयोग पर चिंता जताई हो। अगस्त 2025 में कोर्ट ने कहा था, “प्यार करना अपराध नहीं है। किशोरावस्था में प्रेम संबंधों को POCSO के तहत न देखा जाए।”
उस मामले में कोर्ट ने NCPCR (राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग) और NCW (राष्ट्रीय महिला आयोग) की याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जहां हाईकोर्ट द्वारा नाबालिग जोड़ों को सुरक्षा देने के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने जोर दिया, “यदि ऐसे जोड़ों को सुरक्षा न दी जाए, तो परिवारजन ऑनर किलिंग तक कर सकते हैं। हर मामले को केस-टू-केस आधार पर देखना होगा।”इस फैसले में भी कोर्ट ने सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें पुलिस को निर्देश था कि प्रेम संबंध या विवाह से जुड़े मामलों में POCSO के तहत जल्दबाजी में गिरफ्तारी न करें। SP स्तर के अधिकारी की अनुमति अनिवार्य है।
जस्टिस बोपन्ना ने कहा, “POCSO का उद्देश्य वास्तविक शोषण रोकना है, न कि सहमति वाले किशोर प्रेम को दंडित करना।”प्रभाव और प्रतिक्रियाएं: कानूनी विशेषज्ञों की राययह फैसला POCSO कानून में संशोधन की बहस को तेज कर सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय नाबालिगों के बीच सहमति और प्रेम को मान्यता देता है, लेकिन वास्तविक शोषण के मामलों में सतर्कता बरतने की चेतावनी भी देता है। पूर्व जज जस्टिस (रि.) मदन बी. लोकुर ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने संतुलन बनाया है। कानून कठोर है, लेकिन न्याय मानवीय होना चाहिए।”
विपक्षी दलों ने फैसले का स्वागत किया, जबकि कुछ महिला संगठनों ने चिंता जताई कि यह नाबालिग लड़कियों की सुरक्षा को कमजोर कर सकता है। सरकार ने कहा कि POCSO को और मजबूत करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।