February 1, 2026

नई दिल्ली, 28 दिसंबर 2025 । अरावली पहाड़ियों की हालिया परिभाषा (री-डेफिनिशन) को लेकर उठे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। यह फैसला पर्यावरणविदों, विपक्षी दलों और नागरिकों के विरोध के बीच आया है, जो मानते हैं कि नई परिभाषा से अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है।
कोर्ट ने इस मामले को ‘In Re: Definition of Aravalli Hills and Ranges and Ancillary Issues’ नाम से सूचीबद्ध किया है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय वेकेशन बेंच (जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह के साथ) 29 दिसंबर 2025 (सोमवार) को इसकी सुनवाई करेगी।
विवाद का मूल कारण- 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट (तत्कालीन CJI बी.आर. गवई की बेंच) ने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिशें स्वीकार की थीं।
नई परिभाषा के अनुसार- अरावली हिल्स के आसपास की जमीन से 100 मीटर या अधिक ऊंची कोई भी भू-आकृति।
अरावली रेंज- दो या अधिक ऐसी हिल्स जो 500 मीटर के दायरे में हों, और उनके बीच का पूरा क्षेत्र (ढलानें, हिलॉक सहित)।

पर्यावरणविदों का दावा- इससे अरावली का 90% से अधिक हिस्सा (खासकर कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां) संरक्षण से बाहर हो सकता है। इससे बड़े पैमाने पर खनन, निर्माण और पर्यावरणीय क्षति का खतरा बढ़ेगा।

अरावली का महत्व-अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला (लगभग 2 अरब साल पुरानी) है। यह थार मरुस्थल के पूर्व की ओर फैलाव को रोकती है, भूजल रिचार्ज करती है, जैव विविधता बनाए रखती है और दिल्ली-एनसीआर को रेगिस्तानीकरण से बचाती है।

विरोध और प्रतिक्रियाएं-पर्यावरण संगठन (जैसे अरावली विरासत जन अभियान) और कार्यकर्ता नीलम आहलूवालिया, हितेंद्र गांधी ने कहा कि यह परिभाषा बिना पर्याप्त वैज्ञानिक मूल्यांकन या जन परामर्श के आई है।
राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली में प्रदर्शन जारी हैं। पर्यावरण संगठनों का कहना है कि इससे भूजल गिरावट, जंगलों की कटाई और मरुस्थलीकरण बढ़ेगा।

सरकार और कोर्ट का पक्ष-केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि नई परिभाषा से नए खनन पट्टे पर पूरी तरह रोक है। राज्यों को निर्देश हैं कि सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान तैयार होने तक कोई नई लीज न दी जाए। सरकार का कहना है कि यह वैज्ञानिक और एक समान है, जिससे अवैध खनन रोका जाएगा और 90 प्रतिशत से ज्यादा क्षेत्र संरक्षित रहेगा।

अगला कदम- 29 दिसंबर की सुनवाई में कोर्ट नई परिभाषा पर फिर विचार कर सकती है। संभवतः इसे रिव्यू या संशोधित किया जा सकता है। पर्यावरणविदों की मांग है कि पूर्ण पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) हो और पुरानी सुरक्षा बहाल हो। यह मामला अरावली के संरक्षण, खनन और विकास के बीच संतुलन का बड़ा परीक्षण है। सुनवाई के बाद स्थिति स्पष्ट होगी।

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