गांधीनगर, 12 अगस्त। गुजरात में पाटीदार आंदोलन के दौरान दर्ज किए गए पुराने मामलों को वापस लेने का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा में है। आंदोलन से जुड़े करीब 300 मामलों में से 270 मामले वापस लिए जाने की जानकारी सामने आने के बाद अब बाकी मामलों को लेकर भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।
पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दौरान राज्य के अलग-अलग हिस्सों में प्रदर्शन, बंद और अन्य गतिविधियों को लेकर बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए गए थे। इनमें कई मामले सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, पुलिस से टकराव और प्रदर्शन से जुड़े आरोपों से संबंधित थे।
270 मामलों की वापसी-रिपोर्ट के मुताबिक आंदोलन के दौरान दर्ज लगभग 300 मामलों में से करीब 270 मामले वापस लिए जा चुके हैं। इसके बाद अब शेष मामलों को लेकर भी पाटीदार समुदाय और आंदोलन से जुड़े लोगों की नजर सरकार के अगले कदम पर है।
मामलों की वापसी का मुद्दा पाटीदार आंदोलन के बाद सरकार और समुदाय के बीच बने संवाद का भी हिस्सा रहा है। सरकार की ओर से समय-समय पर आंदोलन से जुड़े मामलों की समीक्षा कर कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें वापस लेने की कार्रवाई की गई है।
पाटीदार नेताओं की नजर बाकी मामलों पर-*मामलों की वापसी के बावजूद बाकी मामलों को लेकर पाटीदार समुदाय के नेताओं की ओर से भी सरकार से स्थिति स्पष्ट करने की मांग उठ सकती है। समुदाय से जुड़े नेताओं का तर्क रहा है कि आंदोलन से जुड़े जिन मामलों में गंभीर आपराधिक आरोप नहीं हैं, उनकी भी समीक्षा कर उन्हें वापस लिया जाना चाहिए।
हालांकि, किसी मामले को वापस लेने की प्रक्रिया आरोपों की प्रकृति, न्यायिक स्थिति और संबंधित कानूनी प्रावधानों के आधार पर तय होती है।
राजनीतिक दलों की भी नजर-पाटीदार समुदाय गुजरात की राजनीति में प्रभावशाली सामाजिक समूहों में शामिल है। ऐसे में आंदोलन से जुड़े मामलों की वापसी का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विधानसभा चुनावों से पहले इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के रुख पर राजनीतिक नजर बनी रह सकती है।
विपक्ष सरकार से यह सवाल उठा सकता है कि बाकी मामलों को वापस लेने को लेकर उसकी क्या योजना है। वहीं सरकार की ओर से कानूनी प्रक्रिया और संबंधित मामलों की स्थिति के आधार पर निर्णय लेने की बात कही जा सकती है।
हार्दिक पटेल आंदोलन के बाद बदला राजनीतिक समीकरण-गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने राज्य की राजनीति पर व्यापक असर डाला था। आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में युवाओं ने आरक्षण की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था। इस आंदोलन से जुड़े नेताओं और सरकार के बीच लंबे समय तक टकराव की स्थिति भी रही। बाद में आंदोलन से जुड़े कई मामलों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हुई। अब करीब 270 मामलों के वापस लिए जाने के बाद शेष मामलों का मुद्दा फिर चर्चा में आया है।



