वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार रात राष्ट्र के नाम अपने प्राइम टाइम संबोधन में एक बार फिर वर्ष 2020 के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने चुनाव सुरक्षा से जुड़े कुछ गोपनीय (Declassified) सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक करने की घोषणा की और दावा किया कि इन दस्तावेजों से चुनावी प्रणाली की गंभीर कमजोरियां सामने आती हैं।
अपने लगभग 25 मिनट के संबोधन में ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन ने अमेरिकी मतदाता डेटा तक पहुंच बनाने की कोशिश की और चुनावी सुरक्षा को प्रभावित करने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ऐसे दस्तावेज सार्वजनिक कर रही है, जिनसे चुनावी व्यवस्था में मौजूद खामियों की जानकारी मिलेगी। साथ ही उन्होंने कांग्रेस से कड़े चुनावी सुधार कानून पारित करने की भी अपील की।
हालांकि ट्रंप ने अपने भाषण में 2020 के चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाले किसी नए प्रत्यक्ष प्रमाण को सार्वजनिक नहीं किया। कई अमेरिकी मीडिया संस्थानों और विशेषज्ञों ने कहा कि राष्ट्रपति ने पुराने आरोपों को दोहराया, लेकिन मतदान में हेरफेर या चुनाव परिणाम बदलने का कोई नया साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया।
डेमोक्रेट्स का पलटवार-डेमोक्रेटिक नेताओं ने ट्रंप के भाषण की तीखी आलोचना की। उनका कहना है कि राष्ट्रपति बिना पुष्ट प्रमाण के 2020 चुनाव को लेकर संदेह पैदा कर रहे हैं, जबकि अदालतें, चुनाव अधिकारी और पूर्व जांच एजेंसियां पहले ही चुनाव प्रक्रिया की वैधता की पुष्टि कर चुकी हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम आगामी मध्यावधि (Midterm) चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने की कोशिश है।
टीवी नेटवर्क्स ने भी दिखाई सावधानी-ट्रंप के भाषण के प्रसारण को लेकर अमेरिकी मीडिया में भी मतभेद देखने को मिले। कुछ प्रमुख टीवी नेटवर्क्स ने भाषण का सीधा प्रसारण किया, जबकि कई अन्य चैनलों ने इसे लाइव प्रसारित करने के बजाय फैक्ट-चेक और विश्लेषण के साथ दिखाया। उनका कहना था कि बिना सत्यापित दावों के सीधे प्रसारण से दर्शकों में भ्रम फैल सकता है।
राजनीतिक बहस फिर तेज-विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने एक बार फिर चुनावी सुरक्षा और 2020 चुनाव को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले यह मुद्दा अमेरिकी राजनीति में बड़ा चुनावी विषय बन सकता है। हालांकि अब तक उपलब्ध आधिकारिक जांचों में 2020 के चुनाव परिणामों में व्यापक धांधली या विदेशी हस्तक्षेप से परिणाम बदलने के प्रमाण स्थापित नहीं हुए हैं।

