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नई दिल्ली:/लखनऊ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बड़ा ऐलान किया है कि विधायिकाओं को अधिक प्रभावी, जनोन्मुखी और जवाबदेह बनाने के लिए ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ तैयार किया जाएगा।
यह घोषणा 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (AIPOC) के समापन सत्र में की गई, जो लखनऊ में तीन दिनों तक चला।लोकसभा अध्यक्ष ने अपने समापन भाषण में कहा, “विधायिका को अधिक प्रभावी, जनोपयोगी और उत्तरदायी बनाने के लिए एक ‘राष्ट्रीय विधायी सूचकांक’ तैयार किया जाएगा। यह सूचकांक विधानसभाओं और विधान परिषदों के प्रदर्शन का उद्देश्यपूर्ण मूल्यांकन और तुलनात्मक आकलन (benchmarking) करेगा, जिससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिता और जनहित में अधिक जवाबदेही सुनिश्चित होगी।” उन्होंने बताया कि इस सूचकांक के लिए एक समिति गठित की जाएगी, जो विभिन्न मापदंडों पर काम करेगी।सूचकांक में क्या शामिल होगा?
सूचकांक विधानसभाओं के कामकाज को कई पैरामीटरों पर मापेगा, जैसे: बहसों की गुणवत्ता और स्तर
सदस्यों की भागीदारी
प्रश्नकाल का उपयोग
पारित विधेयकों की संख्या
सत्रों की अवधि (कम से कम 30 बैठकें सालाना सुनिश्चित करने का लक्ष्य)
निजी संकल्प, सरकारी आश्वासनों का पालन, स्थायी समितियों का काम
संवैधानिक मूल्यों का पालन और अन्य वस्तुनिष्ठ/व्यक्तिपरक पहलू
इससे विधानसभाओं में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, डिस्कशन की संस्कृति मजबूत होगी और हंगामे/गतिरोध कम होंगे। बिरला ने कहा कि लोकतंत्र हंगामे से नहीं, चर्चा से मजबूत होता है। उन्होंने सभी दलों से सदन में सहयोग की अपील की, खासकर आगामी बजट सत्र से पहले नियोजित गतिरोध पर चेतावनी देते हुए।सम्मेलन के अन्य प्रमुख संकल्प
सम्मेलन में कुल 6 प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुए, जिनमें शामिल हैं: डिजिटल और उभरती तकनीकों (जैसे AI) का उपयोग विधायी कार्य में बढ़ाना
विधायकों की क्षमता निर्माण और रिसर्च सपोर्ट सिस्टम मजबूत करना
सभी विधानसभाओं की कार्यवाही को एक प्लेटफॉर्म पर लाना (2026 तक लक्ष्य)
पीठासीन अधिकारियों द्वारा निष्पक्षता, गरिमा और लोकतांत्रिक परंपराओं का पालन
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश और अन्य पीठासीन अधिकारियों ने भी सम्मेलन में भाग लिया। यह कदम लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक पारदर्शी, कुशल और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।लोकसभा अध्यक्ष ने जोर दिया कि विधानसभाओं का समय मूल्यवान है और इसे जनता की आकांक्षाओं को व्यक्त करने के प्रभावी मंच के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह सूचकांक विधायिकाओं में नवाचार, जवाबदेही और जनसहभागिता को बढ़ावा देगा।