January 30, 2026

*पीयूष पुरोहित

केरल की राजनीति में 13 दिसंबर 2025 का दिन एक मील का पत्थर साबित हुआ है। दशकों से वामपंथी और कांग्रेस के द्विध्रुवीय वर्चस्व वाले इस राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने इतिहास रच दिया। राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर एनडीए का कब्जा हो गया है, जो वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) के 45 वर्षों के अटूट शासन का अंत है। यह जीत न केवल स्थानीय निकाय चुनावों की एक घटना है, बल्कि केरल की राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत है।

इस चुनाव में एनडीए को तिरुवनंतपुरम के 101 वार्डों में से 52 सीटें मिलीं, जिसमें भाजपा की 35 सीटें शामिल हैं। इस सफलता के साथ राज्य को अपना पहला भाजपा मेयर मिलने जा रहा है, और इस पद की प्रबल दावेदार हैं पूर्व पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) आर श्रीलेखा, जो केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी हैं।
इस जीत की पृष्ठभूमि को समझने के लिए केरल की राजनीतिक इतिहास पर नजर डालनी जरूरी है। केरल में राजनीति हमेशा से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) नीत एलडीएफ और कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के बीच घूमती रही है।

भाजपा को यहां कभी भी मजबूत आधार नहीं मिला। 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को महज एक-एक सीट मिली थी, और वह भी सहयोगी दलों के माध्यम से। लेकिन 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों ने इस मिथक को तोड़ दिया।
राज्य में कुल 1,200 से अधिक ग्राम पंचायतों, 152 ब्लॉक पंचायतों, 14 जिला पंचायतों, 87 नगर पालिकाओं और 6 नगर निगमों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें यूडीएफ ने शानदार प्रदर्शन किया, चार नगर निगम (कोल्लम, कोच्चि, त्रिशूर और कन्नूर) जीते, जबकि एलडीएफ ने केवल कोझिकोड बचा पाया। लेकिन तिरुवनंतपुरम में एनडीए की जीत ने सबको चौंका दिया। यहां एलडीएफ को 28 सीटें और यूडीएफ को 19 सीटें मिलीं, जबकि दो निर्दलीय भी जीते।
इस चुनाव की कहानी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है। भाजपा ने तिरुवनंतपुरम पर विशेष फोकस किया था। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने यहां की कमान संभाली।

उन्होंने ‘विकसित केरल’ का नारा दिया और विकास के मुद्दों पर अभियान चलाया। शहर में बुनियादी ढांचे की कमी, कचरा प्रबंधन, जल संकट और ट्रैफिक जैसी समस्याओं को केंद्र में रखा गया। भाजपा ने दावा किया कि एलडीएफ का शासन भ्रष्टाचार और अकुशलता से ग्रस्त है।

वहीं, आर श्रीलेखा जैसी हाई-प्रोफाइल उम्मीदवारों को मैदान में उतारा गया। श्रीलेखा, जो सस्थमंगलम वार्ड से जीतीं, पुलिस सेवा में अपनी सख्त छवि के लिए जानी जाती हैं। उन्हें ‘रेड श्रीलेखा’ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि उन्होंने कई बड़े रेड किए थे। उनकी जीत ने महिलाओं और युवाओं को आकर्षित किया। भाजपा सूत्रों के अनुसार, मेयर पद के लिए उनका नाम लगभग तय है, जो केरल में भाजपा की नई छवि को मजबूत करेगा।

केरल में भाजपा की यह सफलता कई कारकों का परिणाम है। सबसे पहले, राज्य में हिंदुत्व की राजनीति का उभार। केरल में ईसाई और मुस्लिम आबादी अधिक है, लेकिन हिंदू वोटरों में भाजपा ने सेंध लगाई, खासकर शहरी क्षेत्रों में। सवर्ण हिंदू समुदायों और कुछ पिछड़े वर्गों ने भाजपा को समर्थन दिया। दूसरे, एलडीएफ सरकार की असफलताएं।

पिनरई विजयन सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जैसे कि गोल्ड स्मगलिंग स्कैंडल और कोविड प्रबंधन में गड़बड़ियां। तीसरे, यूडीएफ की आंतरिक कलह ने भी एनडीए को फायदा पहुंचाया। कांग्रेस में राहुल गांधी और अन्य नेताओं के बीच मतभेद उजागर हुए। इसके अलावा, भाजपा ने सोशल मीडिया और ग्राउंड लेवल कैंपेनिंग पर जोर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस जीत को ‘केरल की राजनीति में वाटरशेड मोमेंट’ बताया और कहा कि लोग विकास के लिए एनडीए को चुन रहे हैं।

इस जीत की प्रतिक्रियाएं भी दिलचस्प हैं। कांग्रेस सांसद शशि थरूर, जो तिरुवनंतपुरम से ही हैं, ने भाजपा के ‘ऐतिहासिक प्रदर्शन’ को स्वीकार किया और इसे ‘राजनीतिक बदलाव’ का संकेत बताया। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यह ध्रुवीकरण की राजनीति का नतीजा हो सकता है। एलडीएफ नेताओं ने इसे ‘अस्थायी’ बताया और आरोप लगाया कि भाजपा ने धनबल और धार्मिक कार्ड का इस्तेमाल किया।

सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि यह राज्य की सेक्युलर छवि के लिए खतरा है। वहीं, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसे 2026 विधानसभा चुनावों की तैयारी बताया। राज्य में एनडीए ने ट्रिपुनिथुरा नगर पालिका भी जीती, जो और मजबूती का संकेत है।


इस सफलता के दूरगामी प्रभाव होंगे
इस सफलता के दूरगामी प्रभाव क्या होंगे? सबसे पहले, 2026 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को बढ़ावा मिलेगा। राज्य में भाजपा का वोट शेयर 2016 के 10% से बढ़कर 2021 में 12% हो गया था, और अब यह और बढ़ सकता है। तिरुवनंतपुरम जैसे शहरी क्षेत्रों में पार्टी का आधार मजबूत होगा। दूसरे, यह केरल की सेक्युलर राजनीति को चुनौती देगा।

राज्य में धार्मिक अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी है, और भाजपा की जीत से ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। तीसरे, विकास के मुद्दे पर फोकस से अन्य पार्टियां भी मजबूर होंगी। एलडीएफ को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी, जबकि यूडीएफ को एकजुट होना होगा।

आर श्रीलेखा जैसी महिलाओं का उभार राज्य में महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बनेगा। वे पुलिस सेवा में अपनी ईमानदारी और साहस के लिए जानी जाती हैं, और मेयर बनने पर शहर की समस्याओं पर फोकस कर सकती हैं।केरल की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना को देखें तो यह जीत महत्वपूर्ण है। राज्य में साक्षरता दर 94% है, लेकिन बेरोजगारी और प्रवासन बड़ी समस्या है। भाजपा ने केंद्र की योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत और पीएम आवास को प्रचारित किया, जो युवाओं को आकर्षित कर सकता है।

केरल की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना को देखें तो यह जीत महत्वपूर्ण है। राज्य में साक्षरता दर 94% है, लेकिन बेरोजगारी और प्रवासन बड़ी समस्या है। भाजपा ने केंद्र की योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत और पीएम आवास को प्रचारित किया, जो युवाओं को आकर्षित कर सकता है। हालांकि, आलोचक कहते हैं कि भाजपा की राष्ट्रीय नीतियां, जैसे सीएए और एनआरसी, राज्य में विरोध का कारण बन सकती हैं। फिर भी, यह जीत दक्षिण भारत में भाजपा के विस्तार का हिस्सा है, जहां तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में भी पार्टी मजबूत हो रही है।

तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर एनडीए का कब्जा केरल की राजनीति में एक नया अध्याय है। यह दिखाता है कि विकास और स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय विचारधारा से ऊपर उठ सकते हैं। आर श्रीलेखा का मेयर बनना महिलाओं के लिए प्रेरणा होगा। लेकिन क्या यह स्थायी बदलाव है या अस्थायी उछाल, यह 2026 बताएगा। फिलहाल, केरल में भगवा लहर ने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *