
नई दिल्ली, 9 दिसंबर । भारत के न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है, जब सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्टों के 44 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने मंगलवार को एक संयुक्त बयान जारी कर वर्तमान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ चल रही कथित मोटीवेटेड कैंपेन पर कड़ी नाराजगी जताई। इस बयान को सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा का प्रतीक माना जा रहा है, जो हाल के दिनों में रोहिंग्या शरणार्थियों से जुड़े विवाद के बीच सामने आया है।
बयान में पूर्व जजों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को बदनाम करने का कोई भी प्रयास पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका की आलोचना जिम्मेदार, तर्कपूर्ण और तथ्य-आधारित होनी चाहिए, न कि किसी सुनियोजित अभियान के रूप में उसकी छवि को धूमिल करने वाली। “न्यायपालिका लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। इसे कमजोर करने की कोई भी कोशिश हमारे संवैधानिक मूल्यों पर सीधा हमला है,” बयान में उल्लेख किया गया है।
यह बयान CJI सूर्यकांत की उस टिप्पणी के संदर्भ में आया है, जो 2 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या मुसलमानों के कानूनी दर्जे पर सुनवाई के दौरान कही गई थी।
CJI ने बेंच की अगुवाई करते हुए पूछा था, “क्या भारत सरकार ने रोहिंग्याओं को शरणार्थी घोषित किया है? क्या घुसपैठियों को रेड कार्पेट वेलकम देना चाहिए?” इस बयान को कुछ वकील संगठनों, पूर्व जजों और एक्टिविस्टों ने पूर्वाग्रहपूर्ण बताते हुए CJI को ओपन लेटर लिखा था। उन्होंने आरोप लगाया कि यह टिप्पणी शरणार्थियों के अधिकारों का उल्लंघन करती है और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानदंडों की अनदेखी है।
हालांकि, रिटायर्ड जजों के इस समर्थन वाले बयान ने इस विवाद को नया रूप दिया है। पूर्व जजों ने तर्क दिया कि भारत ने 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन या उसके 1967 प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इसलिए, रोहिंग्या मुसलमानों को भारतीय कानून के तहत विदेशी माने जाने पर उन्हें वापस भेजना ही एकमात्र विकल्प है।
बयान में कहा गया, “यूएनएचसीआर (संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त) का पहचान पत्र भारतीय कानूनों में कोई विशेष मान्यता नहीं रखता। राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और प्रवासन नीति जैसे मुद्दों पर अदालत का रुख तथ्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि भावनाओं या पूर्वाग्रहों पर।”
विवाद की जड़ रोहिंग्या संकट है, जो म्यांमार में हो रहे जातीय सफाए का परिणाम है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने म्यांमार सेना की कार्रवाइयों को नरसंहार करार दिया है, जिसके चलते लाखों रोहिंग्या पड़ोसी देशों में शरण लेने को मजबूर हैं। भारत में भी हजारों रोहिंग्या रह रहे हैं, और कई मामलों में दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया है। एक याचिका में एक्टिविस्ट रीता मनचंदा ने आरोप लगाया था कि रोहिंग्या लोगों को बिना उचित प्रक्रिया के निर्वासित किया जा रहा है, जो 2020 के सुप्रीम कोर्ट आदेश का उल्लंघन है।
रिटायर्ड जजों ने चेतावनी दी है कि हर मुद्दे को ‘नफरत’ या ‘पूर्वाग्रह’ का चश्मा लगाकर देखना न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करेगा। उन्होंने अपील की कि आलोचना रचनात्मक हो, ताकि न्यायपालिका मजबूत बने। यह बयान न केवल CJI सूर्यकांत का समर्थन करता है, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र की एकजुटता को भी दर्शाता है।
जस्टिस सूर्यकांत का कार्यकाल नवंबर 2025 में शुरू हुआ था, और वे हरियाणा के हिसार से निकलकर सुप्रीम कोर्ट के शिखर तक पहुंचे एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व हैं। उनके नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले पर फटकार लगाई थी, जिसमें ‘पजामे की डोरी खींचना रेप नहीं’ जैसी टिप्पणी की गई थी।
CJI ने कहा था कि ऐसी टिप्पणियां पीड़ितों को हतोत्साहित करती हैं।
यह घटनाक्रम न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चल रही बहस को और तेज कर देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान न केवल आंतरिक एकता का प्रतीक है, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा में न्यायिक भाईचारे की ताकत को भी उजागर करता है।