March 13, 2026

पीयूष पुरोहित

भारत की संस्कृति और परंपराएँ हमेशा से त्याग, सत्य, धर्म और वीरता की प्रेरणा देती रही हैं। इन सबका सबसे भव्य प्रतीक पर्व है विजयादशमी। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाने वाला यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टि से भी गहरा संदेश देता है। यह दिन हमें यह स्मरण कराता है कि असत्य, अन्याय और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः पराजित होते हैं और विजय सत्य व धर्म की ही होती है।

◼ धार्मिक महत्व और मान्यताएँ

विजयादशमी पर्व से जुड़ी दो प्रमुख कथाएँ हमारे ग्रंथों में वर्णित हैं—

◼ राम और रावण की कथा :
त्रेतायुग में रावण ने जब माता सीता का हरण किया, तब भगवान श्रीराम ने धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए लंका पर चढ़ाई की। नौ दिनों तक चले भीषण युद्ध के बाद दशमी के दिन उन्होंने रावण का वध कर विजय प्राप्त की। यह घटना केवल रावण-वध तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आदर्श बन गई कि अन्याय, अहंकार और अधर्म का अंत निश्चित है।

◼ दुर्गा और महिषासुर की कथा :
दूसरी मान्यता के अनुसार, माँ दुर्गा ने नौ रातों तक महिषासुर नामक असुर से युद्ध किया और दशमी के दिन उसका वध कर देवताओं और मानवता को आतंक से मुक्त किया। इसी कारण विजयादशमी को ‘शक्ति की विजय’ का पर्व भी माना जाता है।

◼पर्व की परंपराएँ और लोकाचार

भारत विविधताओं का देश है और हर क्षेत्र में विजयादशमी अपने-अपने ढंग से मनाई जाती है—

रामलीला और पुतला दहन : उत्तर भारत में दशहरे का सबसे बड़ा आकर्षण रामलीला होती है। कई दिनों तक भगवान राम की कथा का मंचन होता है और दशमी के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया जाता है।

शस्त्र पूजन और आयुध पूजन : महाराष्ट्र और गुजरात में इस दिन शस्त्र और औजारों की पूजा की जाती है। यह परंपरा बताती है कि शक्ति का प्रयोग सदैव धर्म की रक्षा और समाज कल्याण के लिए होना चाहिए।

सोना-गोल्ड का आदान-प्रदान : महाराष्ट्र में लोग एक-दूसरे को अपराजिता के पत्ते, जिन्हें ‘सोना’ कहा जाता है, भेंट करते हैं और समृद्धि की कामना करते हैं।

दुर्गा विसर्जन : बंगाल, ओडिशा और असम में विजयादशमी के दिन देवी दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। इसे ‘विदाई’ का पर्व मानकर महिलाएँ एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं और मंगलकामनाएँ देती हैं।

गरबा और डांडिया : गुजरात और पश्चिमी भारत में नवरात्रि के नौ दिनों तक गरबा और डांडिया की धूम रहती है, जो विजयादशमी के दिन समापन पाती है।

विजयादशमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक प्रेरणा है। यह हमें सिखाती है कि सत्य की राह कठिन हो सकती है, पर अंततः विजय उसी की होती है।

यह संदेश देती है कि शक्ति का प्रयोग केवल रक्षा और न्याय के लिए होना चाहिए, न कि अहंकार और अन्याय के लिए। यह पर्व हमें अपने भीतर छिपे रावण—अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और मोह—को पराजित करने की प्रेरणा देता है।
हमें याद दिलाता है कि धर्म और नीति पर चलने वाला समाज ही समृद्ध और सुरक्षित रह सकता है।

◼सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

विजयादशमी का पर्व समाज में भाईचारे, एकता और उत्साह का वातावरण बनाता है। इस दिन मेले, शोभायात्राएँ और सामूहिक आयोजन होते हैं, जिनसे लोगों के बीच मेल-जोल और सद्भावना बढ़ती है। यह पर्व हमारी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम भी है।

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