February 1, 2026

भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी (आप) का जन्म एक क्रांति की तरह हुआ था। अन्ना आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकली इस पार्टी ने भ्रष्टाचार-विरोधी राजनीति और जनसरोकारों के मुद्दों को केंद्र में रखकर देश की जनता को नई उम्मीद दी थी। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे नेताओं ने खुद को आम आदमी के सिपाही के रूप में पेश करते हुए “व्यवस्था बदलने” का वादा किया था। उस समय यह कहा गया था कि यह पार्टी व्यवस्था बदलेगी, भ्रष्टाचार मिटाएगी और राजनीति को स्वच्छ बनाएगी। लेकिन आज की हकीकत यह है कि आम आदमी पार्टी भी उसी पुरानी राजनीति के रास्ते पर खड़ी है, जिस पर चलने वाले दलों के खिलाफ उसने आंदोलन खड़ा किया था। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया कभी “शिक्षा सुधारक” के रूप में पेश किये जाते थे। स्कूलों के मॉडल की तस्वीरें खिंचवाई जाती थीं और उन्हें दिल्ली की राजनीति में “ईमानदारी का चेहरा” बताकर प्रचारित किया जाता था। लेकिन सत्ता की हकीकत अलग निकली। दिल्ली की शराब नीति घोटाले ने उनकी छवि को ध्वस्त कर दिया और उन्हें “शराब क्रांति का जनक” बना दिया। वह लंबे समय तक जेल की सलाखों के पीछे रहे और बाहर आने के बाद अपना विधानसभा चुनाव भी हार गये।

अब पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर मनीष सिसोदिया का बयान, “साम, दाम, दंड, भेद… सच-झूठ… जो भी करना पड़ेगा, करेंगे”, साफ दिखाता है कि आम आदमी पार्टी अब सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। मनीष सिसोदिया का बयान जनता को यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि आम आदमी पार्टी और बाकी पारंपरिक दलों में अब कोई फर्क नहीं बचा है। देखा जाये तो लोकतंत्र में चुनावी जीत का आधार जनता की सेवा और सुशासन होना चाहिए, न कि “किसी भी साधन” से सत्ता हथियाना। लेकिन आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं के शब्दों से यह साफ है कि उनके लिए अब नैतिकता केवल एक खोखला नारा रह गई है।

मनीष सिसोदिया के बयान से पंजाब की राजनीति गर्मा गयी है इसलिए अब आम आदमी पार्टी के नेता सफाई भी देते फिर रहे हैं। पंजाब के मंत्री अमन अरोड़ा कह रहे हैं कि सिसोदिया ने जो कहा वह पार्टी की विचारधारा नहीं है। यहां सवाल उठता है कि अगर पार्टी के राष्ट्रीय स्तर के नेता और अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी सहयोगी, ऐसा बयान देते हैं तो उसे महज़ “व्यक्तिगत राय” कैसे कहा जा सकता है? क्या यह सफाई केवल डैमेज कंट्रोल की कोशिश नहीं है?

देखा जाये तो आम आदमी पार्टी के इस बदले हुए चरित्र से लोकतंत्र को सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि जनता का विश्वास टूट गया है। जो लोग भ्रष्टाचार और व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर सत्ता में आए, अगर वही भ्रष्टाचार और सत्ता-लोलुप राजनीति का हिस्सा बन जाएँ, तो जनता किस पर भरोसा करेगी? सच यही है कि आम आदमी पार्टी अब वैसी ही राजनीति करने लगी है जैसी राजनीति करने का आरोप वह अपने शुरुआती दिनों में दूसरों पर लगाया करती थी। इस सबके चलते भारतीय लोकतंत्र एक बार फिर नैतिकता के संकट का शिकार हो रहा है।

“ईमानदार राजनीति” का नारा देकर पैदा हुई आम आदमी पार्टी अब सत्ता की राजनीति में इस कदर डूब चुकी है कि उसके नेताओं की जुबान पर “साम, दाम, दंड, भेद” जैसे शब्द चढ़ गए हैं। यह वही पार्टी है जिसने जनता को बदले की राजनीति से बाहर निकलने का सपना दिखाया था। लेकिन अब लगता है, आम आदमी पार्टी का असली चेहरा वही है जिससे उसने खुद को अलग दिखाने की कोशिश की थी। और यही लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक संकेत है।

बहरहाल, मनीष सिसोदिया के बयान को लेकर पंजाब की राजनीति गर्मायी हुई है। इस बयान को विपक्षी दलों ने हाथों-हाथ लिया और चुनाव आयोग से शिकायत तक कर दी। पंजाब बीजेपी अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने तो इसे भ्रष्ट और हिंसक तरीकों की पैरवी करार देते हुए सिसोदिया के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। विपक्षी दलों का आरोप है कि सिसोदिया ने चुनाव जीतने के लिए अनैतिक और हिंसक रणनीतियों को स्वीकार किया है। यहां सवाल यह भी उठता है कि सिसोदिया के विवादित बयान पर पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल की चुप्पी यदि आगे भी बनी रही तो क्या इसे उनका मूक समर्थन नहीं माना जायेगा?

-नीरज कुमार दुबे

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